सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु। संवाद
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सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु एवं नेपाल के लुंबिनी विश्वविद्यालय के बीच अनुबंध की प्रक्रिया धीमी पड़ गई है। चार माह से कोई सार्थक पहल नहीं हो सकी है। दोनों देशों के विश्वविद्यालयों में अनुबंध से शोध की प्रवृत्ति को भी बढ़ावा मिलेगा।
भारत-नेपाल सीमा पर स्थित सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु और लुंबिनी विश्वविद्यालय के बीच अनुबंध की प्रक्रिया एक साल पहले शुरू हुई थी। कुलपति प्रो. हरि बहादुर श्रीवास्तव ने विदेशी छात्र-छात्राओं को रिझाने, शोध एवं साहित्य की राह आसान करने के लिए अनुबंध पर विशेष ध्यान था, लेकिन अचानक यह प्रक्रिया थम सी गई है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने अंतिम ड्राफ्ट किया है, लेकिन दोनों विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर नहीं हो सके हैं। हस्ताक्षर से पहले तय होगा कि किन क्षेत्रों में दोनों विश्वविद्यालय मिलकर कार्य कर सकते हैं। भाषा की दिशा में यह महत्वपूर्ण माना जा रहा है। योजना है दोनों विश्वविद्यालयों के शिक्षक एक-दूसरे परिसर में व्याख्यान देने जाएंगे। वहीं विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं नेपाल में भी अध्ययन एवं शोध कार्य करने जाएंगे। इस अनुबंध से दोनों देशों में विदेशी छात्र-छात्राओं की रूझान बढ़ने की संभावना है।
भारत में तथागत बुद्ध की क्रीड़ा स्थली है, जबकि नेपाल के लुंबिनी में जन्म स्थली है। पुरातात्विक धरोहरों पर शोध की राह भी आसान होगी। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में स्थापना के दौरान ही अंतरराष्ट्रीय बौद्ध केंद्र बनाया गया है, लेकिन अब तक इस विभाग की नीव नहीं पड़ी है और एक भी विभागीय शिक्षक की नियुक्ति नहीं हो सकी है। विभाग के समन्वयक प्रो. सुशील तिवारी के मार्गदर्शन में विश्वविद्यालय परिसर के छात्र-छात्राओं के लिए तथागत बुद्ध पर एक सर्टिफिकेट कोर्स संचालित किया जा रहा है। वर्तमान सत्र में सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में छात्र-छात्राओं की संख्या 1300 हो गई है।
सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु एवं लुंबिनी विश्वविद्यालय के बीच अनुबंध की प्रक्रिया जारी है। एक माह के अंदर अनुबंध पत्र पर हस्ताक्षर होने की संभावना है।
-प्रो. हरि बहादुर श्रीवास्तव, कुलपति