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बेटियों के स्कूल की राह रोक रहा ‘डर’

Fri, 27 Sep 2013 05:37 AM IST
Siddhartha nagar
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केस-एक
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जोगिया ब्लॉक के आड़ी गांव की सोनम (बदला नाम) ने इसी साल आठवीं पास की। गरीब घर की यह लाडली पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ा होने के सपने देखती थी, मगर उस वक्त इसके सपने आंखों से झरते आंसुओं के साथ बह गए। हुआ यूं कि खुद पिता ने उसे यह कहते हुए आगे पढ़ने से रोक दिया कि वो उसे रोज पढ़ने के लिए 20 किलोमीटर दूर सनई नहीं भेज सकता। बेटी का आंसुओं से भीगा चेहरा देखकर घरवालों ने समझाया कि वो बड़ी हो गई है और इतनी दूर अकेली उसे नहीं भेजा जा सकता।

केस-दो
सनई से 23 किलोमीटर दूर रहने वाली नगपरी गांव की रीना (बदला नाम) की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। नौवीं की पढ़ाई के लिए कुछ दिन जब ये स्कूल गई तो उसे इस लंबे सफर ने न सिर्फ थकाया बल्कि डराया भी। उसने जब इस बारे अपनी मां से बात की तो अगले ही दिन बाबूजी ने स्कूल नहीं जाने का फरमान सुना डाला। फिर उसने मां-बाप की मान-मनौव्वल की मगर काम नहीं बना। पिता बोले कि उसे वह वहां रखकर नहीं पढ़ा सकते और रोज उसके साथ पढ़ने भी नहीं जा सकते।
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केस-तीन
जोगिया के ही मझवन गांव की रुखसाना (बदला नाम) भी आठवीं के बाद इसलिए नहीं पढ़ सकी क्योंकि मां-बाप उसे 21 किलोमीटर दूर सनई भेजकर नहीं पढ़ा सकते थे। उसे आगे पढ़ने का मन था, मगर वो मां-बाप की मजबूरी के आगे हार गई। उसके सारे सपने घर की चौहद्दी में कैद होकर रह गए। उसकी सहेली को लैपटॉप मिला है। वह गुजरे दिनों को याद करके भावुक हो जाती है। कहती है कि अपनी क्लास में सबसे तेज वह ही थी, मगर भाग्य से भला कौन जीत पाया है।

सिद्धार्थनगर। ये कहानियां जिले के ऐसे बदनसीब बागबां की बेचारी बेटियाें की है, जिन्हें व्यवस्था की बदहाली ने स्कूल से दूर कर दिया। इनके सपनों पर जिले का पिछड़ापन भारी पड़ा। अनहोनी के डर ने खुद सगे मां-बाप को बेटी का ‘दुश्मन’ बना डाला। मजबूरी ऐसी की खुद उन्होंने ही अपनी लाडली के स्कूल जाने पर बंदिश लगा डाली।
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जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य पर काम करने वाली ममता संस्था की सर्वे रिपोर्ट (2009) के मुताबिक 10 से 15 साल के बीच की जिले की 37 फीसद लड़कियां स्कूलों से दूर हैं। इसके पीछे कारण तलाशें तो जिले का पिछड़ापन सबसे अधिक दोषी नजर आता है। शिक्षा का कानून लागू होने के बाद भी जिले के तमाम इलाके ऐसे हैं, जहां जूनियर या इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए थकाऊ दूरी तय करनी होती है। ऐसे में अभिभावक अपनी बेटियों की सुरक्षा को लेकर असहज हो उठते हैं। शोहरतगढ़ इन्वायरमेंटल सोसायटी की ओर से शादी के उम्र में बढ़ोत्तरी करके प्रजनन और लैंगिक सेहत में सुधार को लेकर किए जा रहे काम में लगी आउट रीच वर्कर प्रियंका पांडेय बताती हैं कि दस में से सात लड़कियां दूर पढ़ने जाते वक्त छेड़खानी का शिकार हो रही हैं। जब वो इस बात का जिक्र परिवार में करती हैं तो घर वाले उनकी पढ़ाई छुड़वाना मुफीद मानते हैं। उनका कहना होता है कि इतनी दूर जाकर आखिर कितनी बार वो झगड़ा कर सकते हैं और रोज-रोज बेटी को लेकर पढ़ाने जाना फिर घर ले आना भी तो संभव नहीं।
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