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राप्ती ने तोड़ा वर्ष 1998 का रिकार्ड, हालात भयावह

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सिद्धार्थनगर। सैलाब ने वर्ष 1998 का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। रविवार को राप्ती नदी उच्चतम बाढ़ स्तर को भी पार कर गई। नदी का जलस्तर शाम के पांच बजे तक 85.86 मीटर दर्ज किया गया, जो वर्ष 1998 के जलस्तर (85.82) से चार सेमी अधिक है। राप्ती के जलस्तर में लगातार वृद्धि जारी है। उधर, नगर से सटा जमुआर नाला अब भी उच्चतम बाढ़ स्तर से ऊपर बना हुआ है। बूढ़ी राप्ती के जल में थोड़ी कमी जरूर महसूस की गई है, हालांकि यह कमी बांध टूटने के चलते गांवों में पानी फैलने के कारण बताई जा रही है। राप्ती के उच्चतम बाढ़ स्तर पार करने से जहां बांसी, डुमरियागंज सहित नौगढ़ तहसील क्षेत्र के सैकड़ों गांवों के लिए खतरा बढ़ गया है वहीं गोरखपुर में भी बड़ी तबाही की आशंका जताई जाने लगी है।
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नेपाल से निकली राप्ती बहराइच, बलरामपुर होते हुए डुमरियागंज के पास जिले की सीमा में प्रवेश करती है। बांसी, नौगढ़ के रास्ते यह नदी उसका के तिकोनिया घाट में बूढ़ी राप्ती, कूड़ा सहित अन्य नदियों को समाहित करते हुए गोरखपुर की ओर जाती है। जिले का बड़ा हिस्सा राप्ती के पानी से प्रभावित है। इसमें डुमरियागंज और बांसी जैसे प्रमुख कस्बे भी शामिल हैं। वर्ष 1998 में राप्ती उफनाई थी तो भारी तबाही मची थी। तब बाढ़ से 52 लोग मरे थे और 481 पशुओं ने जान गंवाई थी। इस बार नदी ने फिर रौद्र रूप धारण किया है। एक सप्ताह से लगातार बढ़ रही नदी ने रविवार को उच्चतम बाढ़ स्तर भी पार कर लिया। बाढ़ नियंत्रण कक्ष के मुताबिक राप्ती का उच्चतम जल स्तर 85.82 मीटर है, जो रविवार की सुबह टूट गया। सुबह आठ बजे नदी का जलस्तर 85.86 मीटर रिकॉर्ड किया गया। जलस्तर में वृद्धि लगातार हो रही है। ऐसे में बड़े खतरे का अंदेशा बना हुआ है। जानकारों की मानें तो नदी के बढ़ते जलस्तर से जितना खतरा सिद्धार्थनगर को है, उससे कहीं अधिक संकट गोरखपुर के लिए है। जिले से बाहर राप्ती अन्य नदियों को भी समाहित करते हुए जाती है, लिहाजा गोरखपुर तक पहुंचते नदी का स्वरूप बेहद खतरनाक हो जाता है। जिस तरह अभी से ही वहां तबाही मची हुई है, ऐसे में आगे स्थिति और भी गंभीर होना तय है।

प्रशासन ने भी माना, 98 से भी भयावह है यह बाढ़
- बोले: कमिश्नर राहत के लिए हो रहा युद्धस्तर पर काम, प्रशासन अलर्ट
अमर उजाला ब्यूरो
सिद्धार्थनगर। पिछले एक सप्ताह से तबाही का सबब बने सैलाब को प्रशासन ने भी भयावह माना है। रविवार को कलेक्टर कक्ष में मीडिया से वार्ता में कमिश्नर दिनेश कुमार सिंह ने माना कि इस बार की बाढ़ वर्ष 1998 से भी भयावह है। तब पर्याप्त संसाधन न होने से 52 लोग मारे गए थे, मगर इस बार प्रशासन की सतर्कता से जान-माल को सुरक्षित कर लिया गया है। उन्होंने कहा कि जिले की 4 नदियां अभी भी खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। 643 गांव बाढ़ प्रभावित हैं, जिसमें 323 गांव जलमग्न हैं। कुल 2.68 लाख की आबादी, 42425 पशु बाढ़ से प्रभावित हैं। बचाव कार्य के लिए 185 नाव और 27 मोटर बोट लगाया गया है। इलाहाबाद, वाराणसी से 50-50 और संतकबीरनगर से 20 नाव मंगाई गई है। 47 बाढ़ चौकी, 11 राहत शिविर, 16 राहत वितरण केंद्र संचालित हैं। एनडीआरएफ की 3, पीएसी की दो फ्लड बटालियन राहत कार्य में लगी हैं। अब तक 1270 लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया जा चुका है। एयर फोर्स की मदद से एयर लिफ्टिंग भी की जा रही है। उन्होंने कहा कि जलमग्न गांवों में जहां भी लोग बाहर आने के इच्छुक हैं, उन्हें नाव या हेलीकॉप्टर से 12 घंटे के अंदर बाहर निकाल लिया जाएगा। प्रभावित क्षेत्रों में लगातार खाद्य सामग्री, क्लोरीन की गोली, ओआरएस के पैकेट बांटे जा रहे हैं। पशुओं का टीकाकरण व भूसा वितरण जारी है। उन्होंने जिले में बाढ़ की स्थिति बांधों के टूटने से भयावह हुई है। सबसे ज्यादा नुकसान बूढ़ी राप्ती पर बने अशोगवा-नगवा बांध ने किया है। इस दैवीय आपदा से निपटने के लिए राहत व बचाव के कार्य के साथ कटे तटबंधों को रोकने के लिए प्रयास जारी है। वार्ता के दौरान डीआईजी राकेश साहू, डीएम कुणाल सिल्कू, एसपी सत्येंद्र कुमार व एडीएम प्रमोद शंकर शुक्ल भी मौजूद रहे।
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हर 4 गांव पर पुलिस ने खोली चौकी
डीआईजी राकेश साहू ने बताया कि जो गांव खाली हो रहे हैं, वहां सुरक्षा के भी इंतजाम किए जा रहे हैं। इसके लिए चौकीदारों को लगाया गया है। हर 4 गांव पर एक पुलिस की बाढ़ चौकी स्थापित करने के निर्देश दिए गए हैं। इसमें एक एसआई व 4 कांस्टेबल तैनात रहेंगे। इस टीम को नाव, लाइफ जैकेट व ड्रेगेन लाइट भी उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे सुरक्षा बेहतर ढंग से हो सके।
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