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जिले के 75 फीसदी से अधिक पोखरे व तालाब सूखे

Sun, 19 May 2019 11:35 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर
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शहर के सटे मधुकरपुर गांव में सूखा पड़ा पोखरा। - फोटो : अमर उजाला
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सिद्धार्थनगर। भीषण गर्मी में शहर से लेकर गांव तक जल संकट गंभीर बनता जा रहा है। जिले में सीवान के 75 फीसदी से अधिक पोखरे व तालाब सूख चुके हैं। ऐसे में जल से संबंधित समस्या बढ़ गई है। जल संकट से निपटने के लिए ट्यूबवेल और नहरों के माध्यम से तालाब व पोखरों के भरने का निर्देश भी है। लेकिन अब तक इस दिशा में कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया। जिससे तालाब व पोखरे सूखे पड़े हैं।
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जल संरक्षण को लेकर सरकार व स्थानीय स्तर पर हर वर्ष तालाब व पोखरों की सफाई की जाती है। उनका सौंदर्यीकरण किया जाता है जिससे बारिश का पानी तालाबों में एकत्र हो और जल संकट की समस्या न बने। आंकड़ों पर गौर करें तो हर वर्ष जल संरक्षण के नाम पर तालाबों की सफाई पर करोड़ों रुपये खर्च भी होते हैं। लेकिन भीषण गर्मी में जिले के 75 प्रतिशत से अधिक तालाब व पोखरे सूख चुके हैं। दूर-दूर तक पानी की किल्लत है। अगर सीवान में किसी को पानी की जरूरत पड़ जाए तो पानी नहीं मिलेगा। पशु-पक्षियों को प्यास बुझाने का मुख्य साधन तालाब और पोखरे हैं लेकिन वे बेपानी।

पहले ही सूख चुके थे अधिकांश तालाब व पोखरे
इस वर्ष बारिश कम होने के कारण अधिकांश तालाब व पोखरे भर नहीं थे। बारिश न होने के कारण फसल बचाने के लिए किसानों ने जो पानी था उससे फसलों की सिंचाई कर लिए। ऐसे में अधिकांश तालाब पहले ही सूख चुके थे। मौजूदा हालात पर गौर करें तो 75 प्रतिशत से अधिक तालाब सूखे चुके हैं।
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हर वर्ष पानी भरने का होता है निर्देश
गर्मी शुरू होने के बाद अप्रैल के अंत तक नहरों व ट्यूबवेल के माध्यम से सूखे तालाबों व पोखरों में पानी भरने का निर्देश होता है। इसके पीछे शासन का उद्देश्य था कि पशु और पक्षियों को पानी मिले और आग से निपटने भी तकलीफ न हो।

3388 है तालाब व पोखरों की संख्या
विभागीय आंकड़ों पर गौर करें तो जिले के 1199 ग्राम पंचायतें हैं। इसमें 3388 तालाब और पोखरे हैं। जिनका रकबा 3220 हेक्टेयर भू-भाग पर फैला हुआ है। यह जलीय क्षेत्र घोषित है। प्रशासन के अनुसार जल संरक्षण के लिए इन्हें उपयोग में लिया जा रहा है।

प्राथमिकता के तौर पर पहले गोशाला में पानी की व्यवस्था की जा रही है। इसके अलावा तालाब और नहरों की सफाई कराकर जल्द ही ट्यूबवेल और अन्य संसाधनों से पानी भरवाया जाएगा जिससे कि पशु-पक्षियों को भी पानी के लिए परेशान न होना पड़े।
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-हर्षिता माथुर, सीडीओ
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