सिद्धार्थनगर। सरकारी अस्पतालों में सस्ती और अच्छी स्वास्थ्य सेवा का दावा खोखला साबित हो रहा है। संसाधनों के अभाव से जूझते अस्पतालों में मरीजों का बुरा हाल है। अव्यवस्थाएं हावी हैं। बात जिला अस्पताल की करें तो सौ बेड वाले इस अस्पताल में मरीजों को भर्ती होने के लिए बेड नहीं मिल पा रहा। इमरजेंसी में चारपाई बिछानी पड़ रही है तो जनरल वार्ड में एक बेड पर दो-दो मरीज लेटाए जा रहे हैं। कदम-कदम पर दलाल सक्रिय हैं। अच्छी सुविधा दिलाने के नाम पर दलाल मरीजों का शोषण कर रहे हैं। मरीज कितना भी चाह लें, मगर बेड पर चादर सिर्फ वीआईपी दौरे के समय ही मिलती है। 24 घंटे के कनेक्शन के बाद भी 14-15 घंटे बिजली आपूर्ति के कारण मरीज गर्मी में छटपटा रहे हैं। तीमारदार हाथों से पंखा झलने को मजबूर हैं। करोड़ों खर्च कर ऑक्सीजन पाइप लाइन बिछाने के बाद भी मैनुअल सिलेंडर का सहारा लिया जा रहा है। डिजिटल एक्स-रे के दौर में पुरानी मशीनों से काम चल रहा है। उधार के रेडियोलॉजिस्ट के चलते अल्ट्रासाउंड की सुविधा सिर्फ मंगलवार व शुक्रवार को ही मिल पाती है। अन्य दिनों में मरीजों को प्राइवेट की शरण लेनी पड़ती है।
छितरापार गांव की सोना (50) बुखार, उल्टी-दस्त से पीड़ित हैं। अस्पताल पहुंचीं तो डॉक्टर ने उन्हें भर्ती करने की सलाह दी, मगर जनरल वार्ड में बेड खाली नहीं था। लिहाजा परिजनों ने गैलरी में ही लेटा दिया। फर्श पर चादर बिछाकर लेटी सोना देवी का कहना था कि करीब एक घंटे यहां हो गए। इतना बड़ा अस्पताल है, जब बेड ही नहीं तो यहां रहने का क्या मतलब। बलरामपुर के पचपेड़वा से आए जावेद (25) भी हाथों में इंट्राकैथ लगाकर अल्ट्रासाउंड कक्ष के पास गैलरी में लेटे थे। दो दिनों से भर्ती जावेद के पिता का कहना था कि दो बजे से पहले ही अल्ट्रासाउंड हो पाएगा। भीड़ अधिक है। आज नंबर नहीं आया तो फिर मंगलवार तक इंतजार करना होगा। बाहर ले जाने की हैसियत नहीं और चार दिनों तक इंतजार भी संभव नहीं। इसलिए मरीज को ही उठाकर लाए हैं, ताकि मौका मिलते ही जांच करा सकें। एक्सरे कक्ष के बाहर लगी भीड़ में शामिल सनाउल्लाह को मशीन शुरू होने का इंतजार था। बताया कि पैर का एक्सरे कराने के लिए एक घंटे से इंतजार कर रहे हैं। लो वोल्टेज के कारण डेढ़ घंटे से मशीन नहीं चल पा रही। कब तक चलेगी, यह भी भरोसा नहीं। यहां एक्सरे नहीं हुआ तो फिर बाहर जाना पड़ेगा। पुष्पा, सुषमा, गुजराती सहित डेढ़ दर्जन मरीज एक्सरे के इंतजार में खड़े रहे। एक्सरे टेक्निशियन एसपी मणि त्रिपाठी ने बताया कि मशीनें काफी पुरानी हैं। वोल्टेज कम होने पर नहीं चल पाती। प्रतिदिन 60-70 एक्सरे औसतन होता है। आज 40 ही हो सका। वोल्टेज के कारण ऐसी परेशानी आ जाती है।
एक बेड भर्ती हो रहे दो मरीज
सिद्धार्थनगर। जिला अस्पताल की क्षमता सौ बेड की है। 32 बेड जनरल वार्ड में है और 30 सर्जिकल वार्ड में। इसके अलावा डेंगू वार्ड में 10, आईसीयू में 10 और शेष बेड इमरजेंसी में लगे हैं। बाढ़ के कारण इन दिनों मरीजों की संख्या डेढ़ गुनी हो गई है। ऐसे में मरीजों के लिए बेड नहीं मिल पा रहा। इमरजेंसी वार्ड में टेंट की चारपाई लगाकर मरीज भर्ती किए जा रहे हैं। वहीं जनरल वार्ड में एक बेड पर दो-दो मरीज रखने पड़ रहे हैं। बावजूद कई मरीजों को बेड नहीं मिल पा रहा। शुक्रवार को जनरल वार्ड में 18 नए मरीज भर्ती हुए, जबकि कुल 62 पेशेंट थे। लिहाजा कइयों को वापस भेजना पड़ा।
गर्मी बर्दाश्त न हुई तो घर से लाकर लगाया पंखा
सिद्धार्थनगर। उमसभरी गर्मी में मरीजों का बुरा हाल है। मरीज छटपटा रहे हैं। बिजली रहने पर भी हाथ के पंखे का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। महिला वार्ड में भर्ती एक मरीज के तीमारदारों ने घर से पंखा लाकर लगाया है। उनका कहना है कि अस्पताल के पंखे मानो सिर्फ हिल रहे हैं। एक मरीज को हाथ से पंखा झलती सावित्री ने बताया कि कुछ देर ऐसे बैठे तो जान ही चली जाएगी। भूल से भी ऐसे अस्पताल में नहीं आना चाहिए। अब मरीज भर्ती है तो मजबूरी है।
नहीं शुरू हुआ बर्न यूनिट और हार्ट केयर यूनिट
सिद्धार्थनगर। जिला अस्पताल में करीब पांच वर्ष पहले निर्मित बर्न यूनिट अब तक शुरू नहीं हो सका है। यहां पड़ी कीमती मशीनें खराब हो रही हैं। दरअसल इस वार्ड को अब तक हैंडओवर ही नहीं लिया गया है। बर्न केस के मरीजों को सर्जिकल वार्ड के ही एक हिस्से में भर्ती कर उपचार किया जा रहा है। कुछ ऐसा ही हाल हार्ट केयर यूनिट का भी है। वर्ष 209-10 में निर्मित यह यूनिट कार्डियोलाजिस्ट के अभाव में शुरू नहीं हो पाई है। अंदर करोड़ों की मशीनें धूल फांक रही हैं।
42 डॉक्टरों का पद, 16 खाली
सिद्धार्थनगर। जिला अस्पताल में चिकित्सकों के कुल 42 पद हैं। इसमें सिर्फ 26 की ही तैनाती है। फिजिशियन के दोनों पद रिक्त हैं। चेस्ट फिजिशियन के भरोसे काम चलाया जा रहा है। सर्जन के भी दो में से एक पद रिक्त हैं। स्त्री रोग विशेषज्ञ का पद खाली है। हड्डी रोग, नेत्र रोग विशेषज्ञ, पैथौलाजिस्ट के दो-दो पदों में एक-एक खाली है। सीएमएस के दो पद हैं, सिर्फ एक की तैनाती है। भंडार अधीक्षक के दो पदों पर कोई नहीं है। कार्डियोलाजिस्ट, ब्लड बैंक पैथोलाजिस्ट का पद रिक्त है। ब्लड बैंक अधिकारी के 8 पदों पर सिर्फ एक की तैनाती है। कुछ ऐसा ही हाल तृतीय व चतुर्थ श्रेणी पदों का है। 14 स्टाफ नर्सों के पद के सापेक्ष सिर्फ 4 तैनात हैं। यह पद सृजन भी डेढ़ दशक पहले का है। मौजूदा परिदृश्य में यहां कम से कम 20 स्टाफ नर्स की जरूत है।
स्पीक अप
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वार्ड में नहीं मिला बेड
पिता शिवपूजन मिश्र को उल्टी-दस्त, कमजोरी सहित गंभीर बीमारी है। डॉक्टर ने भर्ती करने को कहा, लेकिन जनरल वार्ड में बेड खाली नहीं था। सर्जिकल में लेकर गए तो वहां यह कहकर लौटा दिया गया कि डॉक्टर ऊपर तक नहीं जाएंगे। मजबूरी में गैलरी में लेटाना पड़ा है। मरीज को घर ले जाएंगे। वहीं से इलाज कराएंगे। -शारदा मिश्र, अहिरौली।
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डॉक्टर ने लिखी बाहर की एक्सरे
हड्डी रोग विशेषज्ञ को दिखाया तो उन्होंने एक्सरे के लिए बाहर भेज दिया। अस्पताल में एक्सरे की सुविधा होते भी रिपोर्ट स्पष्ट न आने की बात कह बाहर भेजा जा रहा। अब डॉक्टर ने जोर दिया था तो बाहर ही एक्सरे कराना पड़ा। 290 रुपये लग गए, जबकि अस्पताल में आधे से भी कम दाम में हो जाता। मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा है। - रेशमा, करौंदा मसीना।
बोलीं सीएमएस, कम संसाधन में दे रहे बेहतर सुविधा
अस्पताल में मैन पॉवर की कमी है। संसाधन भी सीमित हैं। सामान्य दिनों में 700-800 मरीज आते थे, अब 1100-1200 मरीज नियमित आ रहे हैं। मरीजों की भीड़ अधिक होने से एक बेड पर दो-दो मरीज को रखना पड़ रहा है। अस्पताल में दवाओं की कमी नहीं है। लगातार दवाएं आ रही हैं, उसे मरीजों को उपलब्ध भी कराया जा रहा है। अस्पताल में आने से किसी को रोका नहीं जा सकता। फिर दलालों के चेहरे पर तो कुछ लिखा नहीं होता। पूरी कोशिश होती है कि उपलब्ध संसाधनों में ही मरीजों को बेहतर सुविधा दी जा सके। एक्सरे मशीन में अच्छी क्वालिटी की फिल्म लगाई जाती है, लिहाजा रिपोर्ट में गड़बड़ी की बात गलत है। मरीज तो कहते रहेंगे, अब हर किसी को संतुष्ट नहीं किया जा सकता। -डॉ.रोचस्मति पांडेय, सीएमएस।