जिला असपताल में मरीजों की भीड़।
- फोटो : SIDDHARTHNAGAR
लिखा खत पर खत नहीं मिला बच्चों का पैरासिटामॉल सीरप
सिद्धार्थनगर। सरकारी अस्पतालों में भले ही बेहतर इलाज का दावा किया जा रहा हो लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है। जिला अस्पताल में दर्द से लेकर बच्चों को दी जाने वाली पैरासिटामाल सीरप और एंटीफंगल तक की दवाएं खत्म है। इसके चलते अस्पताल के डॉक्टर बाहर की दवा लिख रहे हैं। ऐसे में तीमारदार तो परेशान हो ही रहे है मरीजों की परेशानी भी दोगुनी हो रही है। यह हाल तब जब अस्पताल प्रशासन छह माह के भीतर आठ बार शासन को इस समस्या को लेकर पत्र लिख चुका है। साथ ही स्वास्थ्य मंत्री को भी मामले की जानकारी दे चुका है। अब स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। इस पर न तो जिम्मेदार गंभीर है न ही सत्ता में बैठे माननीय।
जिला अस्पताल में छह माह से 28 जरूरी दवाएं खत्म है। इनमें बुखार, दर्द से लेकर एंटी फंगल और एंटीबॉयोटिक और रक्तचाप तक की दवाएं शामिल है। मरीजों को मजबूरी में डॉक्टरों पर बाहर से दवा लिखने का दबाव बनाया जा रहा है। उधर, जिलाधिकारी के कड़े निर्देश से बाहर की दवा लिखने से साफ मना किया जा रहा है। अब ऐसे में मरीज व तीमारदार कहां जाएं। एंटी बॉयोटिक के नाम पर सिर्फ ओफलोक्स ही उपलब्ध है। जिला अस्पताल में मधुबेनिया क्षेत्र से दर्द की दवा लेने आई विंद्रावती ने बताया कि केवल एक दवा मिली है। अन्य दवाएं बाहर से लेने जाना पड़ेगा। बच्चों का इलाज कराने आई विमलावती ने बताया कि उनके बच्चे को बुखार व दर्द की शिकायत है। पैरासिटामॉल की दवा नहीं मिली। काउंटर पर बच्चों की खांसी की दवा उपलब्ध नहीं है। कुछ ऐसा ही हाल उसका बाजर के राम जियावन ने भी बताया। कहा कि दर्द की दवा बाहर से लेने को कहा गया है। पूछने पर केवल डाइक्लोविन प्लस होने की बात बताई गई, जो साधारण दर्द में काम आती है। इसके अलावा दर्द की कोई भी दवा नहीं दी गई। सीएमएस डॉ. रोचस्मति पांडेय ने बताया कि दवाओं की किल्लत जिला अस्पताल में नहीं है। कुछ दवाओं को लेकर पत्राचार किया गया है। मरीजों की सुविधाओं के लिए लोकल स्तर पर दवाएं खरीद की जा रही है।
----------------------------
स्वास्थ्य मंत्री के सामने उठ चुका है मुद्दा
स्वास्थ्य मंत्री जय प्रताप सिंह जिला अस्पताल का निरीक्षण करने करीब एक पखवाड़े पूर्व पहुंचे थे। उसी समय तीमारदारों ने दवा न होने का मुद्दा उठाया था। उस वक्त मंत्री ने आश्वासन दिया था कि लखनऊ पहुंचते ही संबंधित फर्म को बुलाकर दवा की स्थिति के बारे में जानकारी ली जाएगी। लेकिन एक पखवाड़ा बीतने के बाद भी दवा की उपलब्धता जिला अस्पताल में नहीं हो सकी।