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बौद्ध दर्शन करुणा एवं मैत्री पर बल देता है

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‘दूसरे को हानि न पहुंचाना ही बुद्ध का दर्शन’
दो दिवसीय बौद्ध दर्शन की प्रासंगिकता विषय पर संगोष्ठी का समापन
सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में आयोजित संगोष्ठी में 15 से अधिक शोध पत्रों का वाचन
अमर उजाला ब्यूरो
सिद्धार्थनगर/बर्डपुर। जहां तक बौद्ध धर्म की प्रासंगिकता का सवाल है, आज के युग में यह अत्यंत प्रासंगिक है। आज हम अपने अतीत को भूल गए हैं। अपने अतीत के गौरव को याद रखकर चलना ही भविष्य का निर्माण है। यह बात अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध संस्थान के उपाध्यक्ष हर गोविंद कुशवाहा ने सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय बौद्ध दर्शन की प्रासंगिकता विषय पर आयोजित संगोष्ठी के समापन अवसर पर कही। उन्होंने कहा कि भगवान बुद्ध राज घराने से आते हैं और समाज के निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति की चिंता करते हैं।
दूसरे को हानि न पहुंचाना ही बुद्ध का दर्शन है। ‘अत्त दीपो भव’ की कल्पना को स्वीकार करना आज की महती आवश्यकता है। आज के इस वैज्ञानिक एवं भूमंडलीकरण के रूप में जब पूरी दुनिया आतंकवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद, एवं वर्चश्व के संघर्षरत है तो भगवान बुद्ध की करुणा सहिष्णुता एवं विश्व शांति का संदेश संपूर्ण विश्व का मार्ग दर्शन करेगा।
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संगोष्ठी में विशिष्ट अतिथि के रूप में एएन कॉलेज पटना के प्रो. शैलेश कुमार सिंह बौद्ध दर्शन के व्यापक दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला। संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे भारतीय इतिहास एवं अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के पूर्व अध्यक्ष, प्राचीन इतिहास पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष प्रो. डीएन त्रिपाठी ने कहा कि वर्तमान में बौद्ध दर्शन अत्यंत प्रासंगिक है। बौद्ध धर्म चार आर्य सत्य पर आधारित है। आज अहिंसा उतना ही प्रासंगिक है जितना बुद्ध के समय था।
महात्मा बुद्ध मनुष्य को सामाजिक प्राणी के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। बौद्ध दर्शन की सबसे बड़ी पूंजी मानव द्वारा नैतिक एवं आध्यात्मिक जीवन जीने का निरंतर प्रयास करना है। बौद्ध दर्शन करुणा एवं मैत्री पर बल देता है। पंचशील का सिद्धांत राजनीतिक अर्थों में बौद्ध धर्म से लिया गया है।आज दुनिया की समस्याओं का हल करने के लिए धार्मिक सहिष्णुता, करुणा एवं मैत्री भाव अपनाना होगा। संगोष्ठी से पूर्व मुख्य अतिथि हरगोविंद कुशवाहा को कुलपति प्रोफेसर सुरेंद्र दुबे ने उत्तरीय एवं स्मृति चिह्न भेंट कर स्वागत किया।
विशिष्ट अतिथि प्रो. शैलेश कुमार सिंह को प्रो. डीएन त्रिपाठी ने उत्तरीय एवं स्मृति चिह्न देकर स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन विशेष कार्याधिकारी अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध केंद्र एवं संयोजक राष्ट्रीय संगोष्ठी प्रो. सुशील तिवारी ने किया। संगोष्ठी में 15 से अधिक शोध पत्रों का वाचन हुआ।
इसमें लखनऊ विश्वविद्यालय, गोरखपुर विश्वविद्यालय, सिद्धार्थ विश्वविद्यालय से संबद्ध महाविद्यालयों के लगभग 120 प्रतिभागी सम्मिलित हुए।











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बौद्ध दर्शन करुणा एवं मैत्री पर बल देता है
सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में आयोजित द्विदिवसीय बौद्ध दर्शन की प्रसांगिकता विषय संगोष्ठी का हुआ समापन
अमर उजाला ब्यूरो
सिद्धार्थनगर/बर्डपुर। जहां तक बौद्ध धर्म की प्रासंगिकता का सवाल है, आज के युग में यह अत्यंत प्रासंगिक है। आज हम अपने अतीत को भूल गए हैं। अपने अतीत के गौरव को याद रखकर चलना ही भविष्य का निर्माण करता है। यह बात अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध संस्थान के उपाध्यक्ष हर गोविंद कुशवाहा ने सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय बौद्ध दर्शन की प्रासंगिकता विषय पर आयोजित संगोष्ठी के समापन अवसर पर कही। उन्होंने कहा कि भगवान बुद्ध राज घराने से आते हैं और समाज के निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति की चिंता करते हैं।

रोते हुए जन को हंसाना सबसे बड़ा धर्म है। एक क्रिया से दूसरे को हानि न पहुंचाना ही बुद्ध का दर्शन है। ‘अत्त दीपो भव’ की कल्पना को स्वीकार करना आज की महती आवश्यकता है। आज के इस वैज्ञानिक एवं भूमंडलीकरण के रूप में जब पूरी दुनिया आतंकवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद, एवं वर्चश्व के संघर्षरत है तो भगवान बुद्ध की करुणा सहिष्णुता एवं विश्व शांति का संदेश संपूर्ण विश्व का मार्ग दर्शन करेगा।
संगोष्ठी में विशिष्ट अतिथि के रूप में एएन कॉलेज पटना के प्रो. शैलेश कुमार सिंह बौद्ध दर्शन के व्यापक दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला।
ते हुए कहा कि उसमें प्रतिपादित अष्टांगिक मार्ग ही उसका मूल है। भेदभाव रहित मानव की गरिमा की रक्षा एंव विभिन्न धर्मों एवं पंथो के बीच सामंजस्य स्थापना करना बौद्ध दर्शन का मुख्य उद्देश्य था। बुद्ध द्वारा प्रतिपादित धर्म ही पहला धर्म है। जिसने अपने प्रचार- प्रसार पर ध्यान दिया, लेकिन उसने कही भी किसी अन्य धर्म मान्यता, संस्कृति को विस्थापित या निरस्त करने का प्रयास नही किया। बौद्ध धर्म जिस भी देश में फैला वहां उसने उसी देश की संस्कृति को अपने सिद्धांतो को अक्षुण्य बनाए रखते हुए स्वीकार कियाए क्योंकि बुद्ध किसी भी सिद्धांत को अंतिम या सार्वभौमिक नहीं मानते थे। क्योंकि इसी मान्यता में अन्यों के सिद्धांत एवं संस्कृति को न केवल हीन मानने की बात निहित होती है, बल्कि उन्हें निरस्त करके अपनी ही संस्कृति स्थापित करना निहित होता है।
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संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे भारतीय इतिहास एवं अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के पूर्व अध्यक्ष एवं प्राचीन इतिहास पुरातत्व एवं ससंस्कृति विभाग दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर डीएन त्रिपाठी ने कहा कि वर्तमान में बौद्ध दर्शन अत्यंत प्रसांगिक है। बौद्ध धर्म चार आर्य सत्य पर आधारित है। चौथे आर्य सत्य के अंतर्गत अष्टांगिक मार्गों का प्रतिपादन है। उसके सम्यक अनुशरण से मानवता की सभी समस्याओं का निराकरण सम्भव है। आज अहिंसा उतना ही प्रसांगिक है जितना बुद्ध के समय थता।महात्मा बुद्ध मनुष्य को सामाजिक प्राणी के रूप में प्रतिश्ठित करते हैं। बौद्ध दर्शन की सबसे बड़ी पूंजी मानव द्वारा नैतिक एवं आध्यात्मिक जीवन जीने का निरन्तर प्रयास करना है। बौद्ध दर्शन करुणा एवं मैत्री पर बल देता है। पंचशील जा सिद्धांत राजनीतिक अर्थों में बौद्ध धर्म से लिया गया है। आज दुनिया की समस्याओं का हल करने के लिए धार्मिक सहिष्णुता, करुणा एवं मैत्री भाव अपनाना होगा। संगोष्ठी से पूर्व मुख्य अतिथि हरगोविंद कुशवाहा को कुलपति प्रोफेसर सुरेन्द्र दुबे ने उत्तरीय एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर माल्यार्पण कर स्वागत किया। विशिष्ट अतिथि प्रो. शैलेष कुमार सिंह को संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे डीएन त्रिपाठी ने उत्तरीय एवं स्मृति चिन्ह देकर माल्यार्पण कर स्वागत किया। संगोष्ठी के अंत मे वित्त अधिकारी ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन विशेष कार्याधिकारी अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध केंद्र एवं संयोजक राष्ट्रीय संगोष्ठी प्रो. सुशील तिवारी ने किया। जिसमें 15 से अधिक शोध पत्रों का वाचन हुआ। इस संगोष्ठी में देश के विभिन भागों से लोगो ंने हिस्सा लिया। लखनऊ विश्वविद्यालय, दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, सिद्धार्थ विश्वविद्यालय से संबद्ध महाविद्यालयों के लगभग 120 प्रतिभागी सम्मिलित हुए। इस संगोष्ठी में विश्वविद्यालय में अध्ययनरत छात्र- छात्राओं का ज्ञान वर्धन हुआ। संगोष्ठी में मुख्य रूप से कुलसचिव उदय प्रताप सिंहए परीक्षा नियंत्रक व्यास नारायण सिंह, डॉ. दीपक बाबू, प्रो. दिनेश प्रसाद, डॉ. शिवम शुक्ला, डॉ. पूर्णेश नारायण सिंह, डॉ. दिग्विजय नाथ पांडेय, डॉ. रविंद्र कुमार पांडेय, डॉ. विजय कुमार रॉय, डॉ. आदित्य प्रताप सिंह, डॉ. निर्मला त्रिपाठी, डॉ. अर्चना मिश्रा, डॉ. प्रत्यूष दुबे, डॉ. ब्रजेश कुमार त्रिपाठी, डॉ. प्रताप विजय कुमार आदि प्रोफेसर एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
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