सिद्धार्थनगर। सैलाब से प्रभावित लोगों के प्रति सरकार भले ही गंभीर हो, मगर प्रशासन पूरी तरह संवेदनहीन बना हुआ है। जिले में बाढ़ राहत और बचाव का कार्य सिर्फ मुख्यमंत्री को दिखाने तक था। सीएम के जाते ही स्थिति फिर बदतर हो गई है। शनिवार को जिले में न तो कहीं बचाव कार्य में लगा सेना का हेलीकॉप्टर दिखा और न ही पीड़ितों तक खाद्य सामग्री पहुंचाने की कोई सक्रियता नजर आई। सख्त हिदायतों के बावजूद प्रशासन उन गांवों में भी 24 घंटे बाद राशन-पानी नहीं पहुंचा सका है, जिस ओर खुद मोटर बोट लेकर सीएम पहुंचे थे। शोहतरगढ़ के तौलिहवा, खैरी, भुतहवा, बालानगर, प्रतापपुर, झुंगहवा सहित अन्य मैरुंड गांवों में छतों पर शरण लिए महिला-पुरुष भूखे-प्यासे छटपटाते रहे। सबसे बुरा हाल मासूम बच्चों का है, जो चार दिनों से भूखे हैं।
शुक्रवार को बाढ़ पीड़ितों का हाल जानने आए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रशासन को दो टूक निर्देश दिया था कि बाढ़ पीड़ित कोई भी भूखा न रहे, हर व्यक्ति तक मदद पहुंचनी चाहिए। लापरवाही बरतने वालों पर कार्रवाई होगी। सीएम की इस हिदायत के बाद लोगों में उम्मीद थी कि प्रशासन नींद से जागेगा और पीड़ितों तक भोजन-पानी पहुंचाएगा। इससे इतर शनिवार को स्थिति और भी निराशाजनक रही। उन गांवों में भी मदद के लिए कोई टीम नहीं पहुंच सकी थी, जिनमें सीएम खुद पहुंचे थे। केवल खैरी टोले में लेखपाल आटा-चावल, दाल वितरण करता रहा। शोहरतगढ़ तहसील क्षेत्र के तौलिहवां ग्राम पंचायत के बालानगर टोला में श्रीराम, रघुवीर, जुगुल यादव, जंगबहादुर और बब्बन, तौलिहवा टोले के रामसुमिरन, प्रभु, पुर्णमासी, बरसाती, बालकेश्वर और फुलवरिया टोले के हरिराम, किशोर, भागीरथी, दरसू, झगरु, लक्ष्मण, राधेश्याम व पप्पू का कहना है कि छह दिनों से बाढ़ का पानी भरा होने के कारण उन्हें भोजन-पानी की समस्या उत्पन्न हो गया है। बच्चे तीन-तीन दिनों से भूखे हैं। सरकारी सहायता के रूप में तीन दिन पहले लाई, गुड़ व चना कुछ लोगों को बांटा गया था, मगर उसके बाद राहत सामग्री व राहत कार्य को कौन कहे कोई अधिकारी-कर्मचारी झांकने भी नहीं आया है। गड़रखा ग्रामसभा के कौववा डीह के रहने वाले रामनरायन, ललाऊ और नान्हू को तीन दिनों से छत पर रहकर गुजारा करना पड़ रहा है। उनके मुताबिक उनका पुरसाहाल लेने वाला कोई नहीं है। कमोवेश यही हाल इस तहसील क्षेत्र के तालकुंडा, बैरिहवा, टीकर, पकड़िहवा सहित अन्य गांवों की भी रही। सदर तहसील में भलुहा, फुलवरिया, गौरा, करछुलिया, नगवा, बसावनपुर, चंदरैया, अजगरा, ताल बगहिया, गायघाट, मैनखाई, बकैहनिया सहित अन्य गांवों की भी रही। भूख-प्यास से बेहाल ग्रामीण मदद की आस में प्रशासन की ओर ताक रहे हैं, जबकि जिम्मेदार किंकर्तव्यविमूढ़ बने हुए हैं। राहत सामग्री के नाम पर अब भी लाई-चना के छोटे पैकेट, मोमबत्ती व माचिस बांटा जा रहा है। कई दिनों से भूखे ग्रामीणों के लिए यह सामग्री ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही है।