सिद्धार्थनगर। पूर्वांचल के लिए अभिशाप बन चुके जेई से हर वर्ष सैकड़ों बच्चे मौत की आगोश में सो जाते हैं, जो बचते हैं, उन पर ताउम्र दिव्यांगता का ठप्पा लग जाता है, जिसका दर्द बच्चों के साथ परिवार के सदस्य हर दिन झेलते हैं। लेकिन इस साल बीमारी के प्रकोप में काफी कमी आई है। जहां पर पहले अगस्त माह में सैकड़ों बच्चे जिला अस्पताल में भर्ती हो जाते थे, वही अब तक केवल पांच मरीज ही आए हैं। इसमें दो की मौत हो चुकी है। जबकि तीन सुरक्षित होकर घर लौट गए है। ऐसे में यह माना जा रहा है कि शासन स्तर से चलाए गए अभियान का असर तो है ही। साथ ही लोग जागरूक भी हुए हैं।
भारत-नेपाल सीमा से लगे पूर्वांचल के आधा दर्जन से अधिक जिलों में जेई-एईएस हर साल कहर ढाती है। इसमें सिद्धार्थनगर भी शामिल है। बीमारी को खत्म करने के लिए सरकार की ओर से चलाए गए विशेेष टीकाकरण व जागरूकता अभियान का असर हुआ है। फरवरी से अब तक के आकड़ों पर गौर करें तो पांच बच्चे जेई पीड़ित मिले हैं। इसमें दो की मौत हो गई है। जबकि तीन उपचार के बाद ठीक होकर सही सलामत अपने घर चलने गए हैं। जबकि पिछले वर्ष अगस्त माह के आखिरी सप्ताह तक मरीजों की संख्या 50 पार हो चुकी थी। इसमें तीन की मौत हो चुकी थी। मगर इस बार मरीजों की संख्या उस लिहाज से न के बराबर विभाग मान रही है।
जिला अस्पताल में आए मरीज
15 फरवरी 2018 सूरज (2) पुत्र हरिश्चंद निवासी सोनौरा थाना जोगिया
2. 21 मई आरती (2) पुत्री अजय निवासी चरगहवा थाना त्रिलोकपुर
3. 12 जून दिशा साढ़े तीन वर्ष पुत्री केशन निवासी नौगढ़ थाना सदर इलाज के दौरान दूसरे दिन मौत
4. चार अगस्त नितीश साढ़े तीन साल पुत्र राजू निवासी पकरड़ीहा थाना जोगिया
5. 19 अगस्त शाहिद (2) पुत्र हफीजुल्लाह निवासी महदेवा बाजार थाना सदर, इलाज के दौरान मुत्यु हो गई। स्वास्थ्य कर्मियों के अनुसार सभी में जेई के लक्षण मिले थे।
पिछले वर्ष का आकड़ा
वर्ष 2017 के आकड़ों पर गौर करें 80 बच्चे जेई से पीड़ित मिले थे। इसमें गंभीर होने पर 17 बच्चों को गोरखपुर मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया था। 52 बच्चे उपचार के बाद ठीक घर गए थे। जबकि आठ बच्चों की मौत हो गई थी। तीन लोग खुद बच्चों को लेकर घर चले गए थे।
मिशन इंद्रधनुष के माध्यम से हुआ था टीकाकरण
शासन के निर्देश पर जिले में दो बार 15-15 दिन का विशेष जागरूकता व टीकाकरण अभियान चलाया गया था। इस अभियान में एक से 14 वर्ष तक बच्चों का टीकाकरण किया गया।
जेई-एईएस से बचाव को लेकर जो विशेष जागरूकता अभियान चलाए गए हैं, उसका काफी असर हुआ है। यही वजह है कि इस साल अब तक नाम मात्र के मरीज जिला अस्पताल में इलाज के लिए आए हैं।
-डॉ. रोचस्मती पांडेय, सीएमएस, जिला अस्पताल