शोहरतगढ़ (सिद्धार्थनगर)। बानगंगा नदी के किनारे बसे सैकड़ों गांव के लोगों पर बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। नेपाल की पहाड़ी नदियों से बानगंगा बैराज में बाढ़ के समय आने वाले पानी से विधानसभा क्षेत्र के लोग हर साल बर्बादी का दंश झेलते हैं। बंधों के मरम्मत के नाम पर विभाग के जिम्मेदार सिर्फ खानापूर्ति करते रहते हैं। यही वजह है कि इस वर्ष भी बाढ़ के समय तीन दर्जन से अधिक ग्राम पंचायतों को तबाही से बचा पाना प्रशासन के लिए काफी मुश्किल होगा। कछार क्षेत्र के ग्रामीण मानसून सत्र शुरु होने के साथ ही खौफ के साए में जीने को मजबूर हैं।
गत वर्ष बानगंगा में पहाड़ी नदियों से आई बाढ़ से सैकड़ों गांव प्रभावित हुए थे। पानी के दबाव से मसिना बांध करीब 20 फीट कट गया था। इस पर जिम्मेदारों ने मिट्टी पटाई कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली। बंधों की स्थिति देख यही पता चलता है कि विभाग के जिम्मेदारों को ग्रामीणों की सुरक्षा को लेकर कोई फिक्र नहीं है। इससे बंधे के आसपास बसे गांव के लोग चिंतित है। मसिना बांध के कटान स्थल पर जगह-जगह दरारें बन गई हैं। बानगंगा, मसिना, परसौना बंधे पर रेन कट व रैट होल को अभी तक नहीं भरा गया है। प्लास्टिक की बोरी बंधे के किनारे रख जिम्मेदार सुरक्षा का दावा कर रहे हैं। विभाग ने पिछली बार आई बाढ़ में क्षतिग्रस्त हुए बंधे, पानी के बहाव को मोडने के लिए बने ठोकर आदि का मरम्मत कर खानापूर्ति करते नजर आ रहे हैं। ऐसी दशा में बाढ़ आई तो ग्रामीणों की साल भर की मेहनत व सारी कमाई पानी में समा जाएगी। शासन-प्रशासन कछार क्षेत्र के लोगों की सुरक्षा व व्यवस्था के नाम पर आज तक सिर्फ आश्वासन ही देता आया है। इस कारण बाढ़ से सुरक्षा के नाम पर प्रतिवर्ष सरकार का करोड़ो रुपये पानी में बह जाता है और गांव के लोगों की दशा जस की तस बनी रहती है। इस संबंध में बानगंगा ड्रेनेज खंड के अवर अभियंता एमटी राव ने बताया कि मसिना बंधे पर कटान स्थल को दुरुस्त कराने, बानगंगा बैराज व बंधों पर पिचिंग कार्य व ठोकर की मरम्मत के लिए शासन से साढ़े 18 करोड़ बजट का प्रस्ताव पूर्व की सरकार में मांगा गया था। चुनाव आचार संहिता के कारण बजट उपलब्ध नहीं हो सका। जुलाई माह में बजट मिलने की उम्मीद है। उसके बाद ही बंधों का उचित प्रबंध कराया जा सकता है।
ग्रामीणों में गुस्सा, बोले: सिर्फ बाढ़ में जागते हैं जिम्मेदार
छोटेलाल ने बताया कि बानगंगा नदी में नेपाल की पहाड़ी नदियों से आने वाली पानी से हर साल कछार क्षेत्र के लोगों के साल भर की गाढ़ी कमाई बर्बाद हो जाती है। बाढ़ आने पर शासन-प्रशासन बड़े-बड़े दावों की पोल उजागर हो जाता है। इस समस्या की ओर जिम्मेदारों ने सुध नहीं ली। अब्दुल मजीद ने कहा कि बांधों के किनारे बसे गांव के लोगों की सुरक्षा के नाम पर प्रतिवर्ष शासन करोड़ों रुपये भेजता है। विभाग की ओर से शासन से मिले बजट का सही ढंग से उपयोग न होने से गांव के लोगों को बाढ़ का दंश झेलना पड़ता है। राममिलन ने कहा कि बरसात का मौसम शुरू होता देख बांधों के किनारे बसे लोग सदमे में है। ग्रामीणों का कहना है कि विभाग के जिम्मेदारों पर कार्रवाई होती तो निश्चित ही कार्य में काफी हद तक सुधार होता। बाढ़ आने पर जिम्मेदार विभाग, प्रशासन व जनप्रतिनिधि राजनीति में लगे रहते है। किसी ने स्थायी सुरक्षा के नाम पर कोई ठोस पहल अभी तक नहीं किया। बुजुर्ग रोजन ने कहा कि नदी के बांधों के किनारों पर रहने वाले लोग 60 वर्षों से बाढ़ का दंश झेलते आ रहे हैं। शासन-प्रशासन के लोगों को को बाढ़ के बीच एक रात गुजारनी पड़े तो शायद पीड़ा पता चलें।