गंध कुटी में प्रार्थना करते वियतनाम के अनुयायी। - संवाद
कटरा। बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती शनिवार को वियतनाम से आए अनुयायियों के 60 सदस्यीय दल से गुलजार रही। सभी ने बौद्ध भिक्षु भंवरानंद के नेतृत्व में पारंपरिक ढंग से बोधिवृक्ष का दर्शन-पूजन किया। इस दौरान बौद्ध सभा का भी आयोजन किया गया।
बौद्ध सभा को संबोधित करते हुए भिक्षु भंवरानंद ने बोधिसत्व और बुद्धत्व के मार्ग पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि दस परमिताओं का पालन करने वाला बोधिसत्व कहलाता है। बोधिसत्व जब दस बलों या भूमियों को प्राप्त कर लेते हैं, तब बुद्ध कहलाते हैं। बुद्ध बनना ही बोधिसत्व के जीवन की पराकाष्ठा है, जिसे बोधि यानी ज्ञान कहा गया है।
उन्होंने आगे बताया कि बुद्ध शाक्यमुनि केवल एक बुद्ध नहीं हैं, उनसे पहले भी कई बुद्ध हुए हैं और भविष्य में भी होंगे। कोई भी व्यक्ति दस परमिताओं का पालन कर बोधिसत्व और फिर दस बलों को प्राप्त कर बुद्ध बन सकता है। बौद्ध धर्म का अंतिम लक्ष्य मानव समाज से दुख का अंत करना है।
बुद्ध ने कहा था, मैं केवल एक ही पदार्थ सिखाता हूं कि दुख है, दुख का कारण है, दुख का निरोध है और दुख के निरोध का मार्ग है। बौद्ध अनुयायी अष्टांगिक मार्ग पर चलकर अज्ञानता और दुख से मुक्ति तथा निर्वाण पाने का प्रयास करते हैं।