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श्रीलंका के बौद्ध अनुयायियों ने की पूजा

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कटरा (श्रावस्ती)। बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती में चल रहे विशेष वर्षावास पूजा में शामिल होने के लिए रविवार को 150 सदस्यीय श्रीलंकाई दल तपोस्थली पहुंचा। दल में शामिल सदस्यों ने दीपालोक महाथेरो के नेतृत्व में गंध कुटि पर विशेष पूजा अर्चना की। इस दौरान समूची तपोस्थली बुद्धम् शरणम् गच्छामि से गूंजायमान रही।
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पूजन के उपरांत दीपालोक महाथेरो ने कहा कि बुद्ध ने ज्ञान की प्राप्ति के लिए गृहत्याग के बाद सात दिन अनुपीय नामक ग्राम में बिताए। फिर गुरु की खोज में वह मगध की राजधानी पहुंचे। जहां कुछ दिनों तक वह आलार कालाम नामक तपस्वी के पास रहे। इसके बाद वह एक आचार्य के साथ भी रहे लेकिन उन्हें कहीं संतोष नहीं मिला। अंत में ज्ञान की प्राप्ति के लिए उन्होंने स्वयं ही तपस्या शुरू कर दी।
कठोर तप के कारण उनकी काया जर्जर हो गई थी, लेकिन उन्हें अभी तक ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई थी। घूमते घूमते वह एक दिन गया में उरुवेला के निकट निरंजना (फल्गु) नदी के तट पर पहुंचे। वहां एक पीपल के वृक्ष के नीचे स्थिर भाव में बैठ कर समाधिस्थ हो गए।
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इसे बौद्ध साहित्य में ‘संबोधि काल’ कहा गया है। छह वर्षों तक समाधिस्थ रहने के बाद जब उनकी आंखें खुलीं और उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। वह वैशाख पूर्णिमा का दिन था और वह महात्मा गौतम बुद्ध कहलाए।
उस स्थान को बोध गया व पीपल का पेड़ बोधि वृक्ष कहा जाता है। इस दौरान समूची तपोस्थली बुद्धम् शरणम् गच्छामि, धम्मम् शरणम् गच्छामि से गूंजायमान रही। इसके बाद दल के सदस्यों ने तपोस्थली के विभिन्न मूमेंटों का भ्रमण कर उसकी ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त किया।
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