कटरा (श्रावस्ती)। साफ-सफाई के अभाव में सीताद्वार झील जलकुंभी व शैवाल के साथ ही कचरे से पटी पड़ी है। कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाले मेले में हजारों लोग इस झील में स्नान करके माता सीता का आशीर्वाद लेते हैं। मेला लगने में केवल सप्ताह भर ही बाकी है। इसके बावजूद झील की सफाई नहीं कराई गई। ऐसे में इस बार झील के दूषित जल में ही श्रद्धालुओं को गोता लगाना पड़ेगा।
श्रावस्ती सहित आसपास जिलों में सीताद्वार मेले का अपना ही महत्व है। मान्यता के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम द्वारा परित्याग किए जाने के बाद माता सीता ने इसी झील के किनारे बने वाल्मीकि आश्रम में रहकर लव व कुश को जन्म दिया था। इसी झील के किनारे राम के अश्वमेघ के घोड़े को पकड़ कर लव व कुश ने राम के साथ ही हनुमान को युद्ध के लिए ललकारा था।
पौराणिक मान्यता है कि इस पवित्र झील में कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान-दान करने से मानव के समस्त कष्टों का निवारण होता है। इसी मान्यता के चलते इकौना के सीताद्वार झील पर कार्तिक पूर्णिमा के दिन विशाल मेले का आयोजन किया जाता है।
तीन दिन तक चलने वाले इस विशाल मेले में सिर्फ जिले के ही नहीं अपितु देवीपाटन व अयोध्या मंडल से भी लाखों श्रद्धालु प्रतिवर्ष शामिल होने आते हैं। इस पवित्र झील में स्नान-दान करके पुण्य कमाते हैं। इतना ही नहीं कार्तिक अक्षय नवमी व देवोत्थानी एकादशी पर भी लोग स्नान-दान के लिए आते हैं।
सैकड़ों एकड़ में फैली इस झील में जलकुंभी व शैवाल सहित अन्य झाड़ियां उगी हुई हैं। इसे साफ कराने की ओर न तो जिला प्रशासन और न ही इस मंदिर व झील के नाम पर लाखों रुपये कमाने वाला ग्राम पंचायत टंड़वा महंत ही ध्यान दे रहा है। कार्तिक पूर्णिमा मेले को सिर्फ सप्ताह भर ही बाकी है। ऐसे में यहां आने वाले श्रद्धालुओं को झील के दूषित जल में ही स्नान करना पड़ेगा।
एडीएम योगानंद पांडे ने बताया कि झील की साफ-सफाई के लिए ग्राम प्रधान को निर्देश दिया जा चुका है। कार्तिक पूर्णिमा मेला शुरू होने के पहले ही मजदूरों से झील की सफाई करा दी जाएगी।