श्रावस्ती। विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुके गिद्धों का एक झुंड हरिहरपुररानी गांव के निकट दिखा। इन्हें देखने के लिए आसपास के गांवों के लोग इकट्ठा हो गए। गिद्धों के दिखने से प्रकृति प्रेमियों में खुशी की लहर है। गिद्ध अब यदाकदा ही नजर आते हैं। हालांकि इनके संरक्षण के लिए जिले में किसी विशेष परियोजना का संचालन नहीं हो सका है।
दो दशक पूर्व जहां-तहां दिखने वाले गिद्ध अब कहीं नजर नहीं आते हैं। बृहस्पतिवार को भिनगा-बहराइच मार्ग के किनारे हरिहरपुररानी मोड़ के पास ही गिद्धों का एक झुंड नजर आया। वहां से जो भी गुजरता, वह रुककर उन्हें एक नजर बिना देखे आगे नहीं बढ़ता।
कई लोगों ने तो उनकी तस्वीरें भी खींची। पर्यावरण प्रेमी गिद्धों के झुंड दिखने से उत्साहित हैं। साथ ही इसे पर्यावरण के लिए अच्छा संकेत भी मान रहे हैं। लोगों का मानना है कि यह प्राकृतिक सफाई कर्मी हैं, जो मृत पशुओं के अवशेष खाकर वातावरण को दूषित होने से बचाने का काम करते हैं।
पहले भी नजर आ चुके हैं गिद्धों के झुंड
तराई में पहले भी गिद्धों के झुंड नजर आ चुके हैं। ये कभी भंगहा तो कभी गिलौला, सिरसिया व लक्ष्मणपुर इटवरिया क्षेत्र में देखे गए हैं। ये गिद्ध प्रवासियों की तरह आते हैं, इसके बाद लौट जाते हैं। सीवीओ डॉ. सुनील कुमार सिंह ने बताया कि दुधारू पशुओं से अधिक दूध लेने के लिए कई बार लोग ऑक्सीटोसिन का प्रयोग करते हैं। वहीं, जब इन पशुओं की मौत होती है तो ये गिद्ध इनका मांस खाते हैं, जिससे गिद्धों की गर्दन कमजोर होकर टूट जाती है। इसी वजह से गिद्धों की संख्या लगातार घट रही थी, लेकिन विभागीय सख्ती के कारण अब हानिकारक दवाओं के प्रयोग पर प्रतिबंध लगने से उनकी संख्या बढ़ी है।
शिकार पर है प्रतिबंध
गिद्धों के संरक्षण के लिए कई जिलों में गरुण संरक्षण केंद्र आदि की स्थापना की गई है, लेकिन इस जिले के लिए अभी किसी विशेष परियोजना को लागू नहीं किया गया है। विभाग की ओर से गिद्धों के शिकार को भी प्रतिबंधित किया गया है। गिद्धों का दिखना पर्यावरण के लिए शुभ संकेत माना जा सकता है।
- धनराज मीणा, डीएफओ