श्रावस्ती। राजकीय निर्माण निगम के जेई ने न्यायालय व जजेज आवास निर्माण में सामग्री आपूर्ति व कार्य के भुगतान के लिए एआरई व ठेकेदार पर धमकाने का आरोप लगाया है। जेई ने निगम के महाप्रबंधक को पत्र लिख मामले की शिकायत कर जांच की मांग की है। वहीं महाप्रबंधक ने मामले में जांच करने को निर्देश दिया है। उधर एआरई ने एक जनप्रतिनिधि पर जबरन कार्य कराने का आरोप लगाते हुए पूरे मामले से पल्ला झाड़ लिया है।
उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम लिमिटेड की ओर से जिले में दस कोर्ट भवन एवं जजेज आवास का निर्माण कराया जा रहा है। कोर्ट निर्माण के साथ ही कैंपस डेवलेपमेंट, रोड व अन्य कार्य भी हो रहा है। इन सभी कार्यों में सामग्री आपूर्ति व सिविल कार्य हथियाने के लिए होड़ लगी है। इसी कार्य को लेकर निगम के उप अभियंता राजेंद्र प्रसाद ने महाप्रबंधक यतेंद्र कुमार को एक शिकायती पत्र भेजा है।
इसमें उन्होंने कहा है कि सहायक स्थानीय अभियंता (एआरई) अपने लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए उनसे सामग्री की आपूर्ति करा रहे हैं। वहीं कुछ ठेकेदार भी जबरन कार्य कराने में जुटे हैं। ऐसे में ठेकेदार व एआरई भुगतान के लिए जान उनको जान से मारने की धमकी दे रहे हैं। मेसर्स तिवारी कंसट्रक्शन के प्रतिनिधि संतोष कुमार तिवारी की ओर से दस कोर्ट भवन एवं जजेज आवास पर सामग्री सप्लाई एवं सिविल कार्यों के भुगतान के लिए दबाव बनाया जा रहा है। इसके साथ ही उसे जान से मारने की धमकी दी जा रही है। इसमें सहायक स्थानीय अभियंता सरोज कुमार सिंह भी शामिल हैं।
शिकायत को गंभीरता से लेते हुए महाप्रबंधक ने इकाई प्रभारी को मामले की जांच करने का निर्देश दिया है। वहीं इस संबंध में एआरई सरोज कुमार सिंह ने बताया कि एक जनप्रतिनिधि के लोग यहां काम करना चाहते हैं। उन्हीं से शायद जेई का कुछ विवाद हुआ हो। फिलहाल जेई ने जो भी आरोप मेरे ऊपर लगाया है वह निराधार हैं।
यहां काम कराने की मची होड़
निर्माण निगम ने न्यायालय निर्माण के लिए टेंडर निकाला था। इसमें भवन का निर्माण हो रहा है। इस टेंडर के बाद कराए गए रिवाइज स्टीमेट में दीवानी न्यायालय कैंपस में मिट्टी भराई व आरसीसी रोड निर्माण की स्वीकृति मिली थी। इसमें मिट्टी भराई के लिए तीन करोड़ एक लाख बहत्तर हजार रुपये, नौ मीटर चौड़ी सीसी रोड निर्माण के लिए एक करोड़ चौदह लाख तिरपन हजार, छह मीटर चौड़ी सीसी रोड के लिए 27 लाख 54 हजार व उद्यानी करण के लिए बीस लाख रुपये दिए गए। कार्रदायी संस्था की ओर से इस पैसे के लिए टेंडर प्रक्रिया करने के बजाए स्वयं कार्य कराने की प्रक्रिया प्रारंभ करा दी गई। इसी के बाद विभागीय अधिकारी व जन प्रतिनिधि अपने अपने लोगों के माध्यम से आपूर्ति व कार्य कराने की होड़ में लग गए। इसी के बाद से विवाद प्रारंभ हो गया।