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भाइयों की कलाई में सजेगी इलेक्ट्रिक, कार्टून व चांदी की राखी

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श्रावस्ती। रक्षाबंधन का पर्व नजदीक आ रहा है। इसकी तैयारियां शुरू हो गई हैं। सड़क किनारे रंग बिरंगी राखियों से सजी दुकानें लग रही हैं। सराफा व्यवसायी भी इस अवसर का लाभ उठाने की तैयारी कर रहे हैं। इस बार चांदी के गणेश लक्ष्मी की आकृति वाली राखी कई डिजाइनों में बाजार में उपलब्ध हैं। वहीं इलेक्ट्रिक लाइट सहित कार्टून वाली राखियां बच्चों को लुभा रही हैं। इस बार बाजार में एक रुपये से लेकर दो सौ रुपये तक की राखी उपलब्ध है। इसमें म्यूजिकल राखी से लेकर रेशमी धागे तक मौजूद हैं।
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रक्षा बंधन का त्योहार भाई बहन के लिए विशेष महत्व रखता है। इस त्योहार को चाहे गरीब हो या अमीर सभी अपने अपने तरीके से मनाते हैं। इसलिए बाजार का रंग भी मांग के आधार पर चढ़ा है। तीन अगस्त को होने वाले त्योहार को देखते हुए भिनगा बाजार सहित इकौना, गिलौला, जमुनहा सहित अन्य बाजारों के फुटपाथ की पटरियों पर छोटे छोटे राखी के स्टाल लग रहे हैं। अमूमन इन स्टालों पर एक रुपये के रेशमी धागे से लेकर दो सौ रुपये तक अलग अलग मॉडल की राखी सजी हुई हैं।
इसमें बच्चों को लुभाने के लिए कार्टून व इलेक्ट्रिक राखी के साथ ही म्यूजिकल राखी बाजार में हैं। यही नहीं त्योहार में मांग को देखते हुए सराफा बाजार पर भी राखी का रंग चढ़ा हुआ है। यहां कई मॉडल की राखियां उपलब्ध है। जो 300 रुपये से लेकर 1100 रुपये तक की है। इसमें गणेश लक्ष्मी के चित्र वाली चांदी व मोतियों से गुथी हुई राखी लोगों के बीच ज्यादा आकर्षक बनी हुई है।
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गायब हो रहे गजरे, बंद हो रहा उद्योग
आधुनिकता की चकाचौंध में स्थानीय स्तर पर बनने वाले गजरे गायब हो रहे हैं। पहले भिनगा के पटहर मोहल्ले में रक्षा बंधन के एक माह पूर्व से गजरे बनाने का कारोबार शुरू हो जाता था। इसमें लाल हरे रंग के ऊन व सन का इस्तेमाल होता था। सन को पहले साफ करके कूटा जाता था। इसके बाद वह दिखने में धागे जैसा दिखता था। इसके बाद उसे लाल व हरे रंग में रंग कर गजरा बनाया जाता था। एक दशक पहले तक औसतन यह गजरा एक रुपये में चार व पांच मिलता था।
इसी गजरे का बनाते समय कई मॉडल दिए जाते थे। ताकि लोगों के बीच आकर्षण बड़े। बाद में आधुनिकता का रंग चढ़ा तो गजरे के साथ साथ प्लास्टिक, फाम की राखियां बनने लगी। इसमें चमकीले के बेस पर फाम फिर प्लास्टिक के डिजाइन वाले चित्र को लगा कर राखी बनने लगी। धीरे धीरे स्थानीय बाजार पर आधुनिकता का दबदबा बढ़ा तो देशी गजरा महंगा पड़ने लगा। श्रम अधिक, मुनाफा कम के कारण यह धीरे धीरे बनना बंद सा हो गया। अभी भी कुछ एक घरों में गजरे बनाए जाते हें। जिन्हें ग्रामीण क्षेत्रों के लोग खरीद कर ले जाते हैं। इन गजरों की मांग अधिकांशता रक्षाबंध के पहले लगने वाले साप्ताहिक बाजारों में होती है।
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