श्रावस्ती। यह कहानी जिले के उन 113 आजादी के दिवानों की है। जिन्होंने अंग्रेज अफसरों की नाक में दम कर दिया था। इसमें से कई ऐसे आंदोलनकारी भी हैं। जिनका आजाद भारत देखने का सपना गुलामी की जंजीरों के साथ ही दफन हो गया। आज पूरा देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। तो एक दीप इन आजादी के दीवनों के नाम पर भी जलाएं। जिन्होंने अपने खून से श्रावस्ती की धरती को सींचा था।
पांच पैसे की लूट में सुनाई गई 24 वर्ष की जेल
कहानी भारत छोड़ो आंदोलन (सन 1942) की है। उस समय पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन चल रहा था। ऐसा ही आंदोलन मौजूदा श्रावस्ती (जो उस समय बहराइच जिले का हिस्सा हुआ करता था) में भी चल रहा था।
अंग्रेजों के सामने अपना विरोध दर्ज कराने के लिए श्रावस्ती के भगवानपुर में आजादी के दीवानों ने डाक लूटने का प्लान बनाया। उस समय जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वामी दयाल, रामसुंदर व मुटरू ने तीन फरवरी 1943 में भगवानपुर गांव के पास ही आ रहे डाकिए की डाक लूट ली। इस डाक लूट के समय डाकिए के बोरे में केवल पांच पैसा व कुछ पत्र थे। जिसे तीनों लोगों ने निकट के एक कुएं में डाल दिया था। इस मामले में अंग्रेज पुलिस ने तीनों लोगों को गिरफ्तार कर लिया था। इस पर 09 फरवरी 1943 को ही इन्हें इस लूट के लिए 24 वर्ष कारावास की सजा सुनाई गई। इस सजा के बाद 10 मार्च 1943 को हुई अपील में सुंदर लाल छूट गए थे। जबकि मुटरू व स्वामी दयाल की सजा दस वर्ष कर दी गई थी। अब तक के इतिहास में यह सबसे कम पैसे की लूट में सबसे कठोर सजा मानी जा रही है। जिसे इन आंदोलनकारियों को भुगतना पड़ा था।
श्रावस्ती था प्रमुख पड़ाव
स्वतंत्रता आंदोलन के सभी चरणों में श्रावस्ती एक प्रमुख पड़ाव के रूप में था। यदि आंदोलन में भाग लेने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की संख्या पर निगाह डालें तो श्रावस्ती में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की संख्या बहराइच के सापेक्ष अधिक थी। उस समय करीब 210 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। जो अंग्रेजी हुकूमत की प्रताड़ना का शिकार होकर कम से कम छह माह की कैद भुगत चुके थे। इसमें से 113 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्रावस्ती के हिस्से में थे। इसमें से कुछ लोगों ने छह माह से लेकर 24 वर्ष तक की कारावास के साथ अर्थदंड को झेला। इसमें से कई तो ऐसे थे जो अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा जेल में बिता दिया।
भिनगा में महिलाओं ने पहली बार आंदोलन में किया था प्रतिभाग
19 दिसंबर 1932 को एक झंडा जुलूस निकाला जाना था। यह झंडा जुलूस स्वयंसेवक भिनगा में भी निकालना चाहते थे। यह पहला अवसर था जब इस आंदोलन में जिले की 15 महिलाओं ने भी झंडा आंदोलन में प्रतिभाग किया था। इसमें से पांच महिलाओं को पुलिस ने गिरफ्तार करके जेल भी भेजा था। इस पूरे मामले में 290 कार्यकर्ता गिरफ्तार किए गए थे। जिनमें से 230 को छह माह से लेकर डेढ़ वर्ष तक की सजा सुनाई गई थी। मामला 19 दिसंबर 1932 का है। भिनगा में एक झंडा जुलूस निकाला गया था। जिसमें आठ स्वयंसेवक शामिल हुए थे। जब यह जुलूस भिनगा के चौराहे पर पहुंचा तो अंग्रेज पुलिस इन्हें पकड़ कर कोतवाली ले आई। यहां पहले इनके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया। यही नहीं पिटाई के कुछ देर बाद बिना खाना दिए इन्हें सोहेलवा के जंगल मे पेड़ों पर बांध दिया गया। बाद में इन स्वयंसेवकों को जंगल में मवेशी चरा रहे चरवाहों ने छुड़ाया। इन्हीं की मदद से यह अपने घर पहुंचे। इस घटना से पूर्व पंडित जवाहर लाल नेहरू 07 अक्तूबर 1931 को सोनवा, गिलौला व इकौना में आकर एक जोरदार भाषण दिया था।