भगवान बुद्ध की प्रतिमा लेकर जेतवन परिसर का भ्रमण करते अनुयायी।
- फोटो : भगवान बुद्ध की प्रतिमा लेकर जेतवन परिसर का भ्रमण करते अनुयायी।
कटरा (श्रावस्ती)। बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती मंगलवार को विभिन्न देशों से आए अनुयायियों से गुलजार रही। मंगलवार को तपोस्थली पर दर्शन-पूजन के लिए श्रीलंका के 600, मलेशिया के 80, नेपाली के 40, म्यांमार के 120, थाईलैंड के 30 व अन्य देशों के 160 बौद्ध अनुयायी तपोस्थली पहुंचे। सभी ने बौद्ध भिक्षु दीपालोक महाथेरो के नेतृत्व में जेतवन परिसर में पारंपरिक तरीके से पूजा-अर्चना की। इस दौरान बौद्ध सभा का भी आयोजन किया गया।
बौद्ध सभा में मौजूद अनुयायियों को संबोधित करते हुए भिक्षु दीपालोक ने कहा कि जेतवन क्षेत्र के लोग गौतम बुद्ध के बहुत बड़े भक्त थे। मिलिन्द प्रश्न नामक ग्रंथ में कहा गया है कि इसमें भिक्षुओं की संख्या पांच करोड़ थी। वहीं, तीन लाख सत्तावन हजार गृहस्थ भी बौद्ध धर्म को मानते थे। जेत नाम के राजकुमार ने जेतवन उद्यान को लगाया था। यहां रहने वाले अनाथपिडिंक सेठ बुद्ध के प्रिय शिष्य थे और उन्होंने जेतवन को खरीद कर बौद्ध संघ को दान किया था।
बौद्ध ग्रंथों की कथा के अनुसार सेठ ने जेतवन को खरीदने के लिए उतनी मुद्राएं दी थी, जिन्हें बिछाने पर पूरे जेतवन की फर्श ढक जाती। सेठ ने यहां एक मठ भी बनवाया था, जहां श्रावस्ती आने पर भगवान बुद्ध विश्राम करते थे। इसे लोग कोशल मंदिर भी भी कहते थे। अनाथपिंडिक ने जेतवन के भीतर कुछ और भी मठ बनवा दिये, जिनमें भिक्षु लोग रहते थे। इनमें प्रत्येक के निर्माण में एक लाख मुद्राएं खर्च हुई थीं।