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घर वापसी करने वालों में 48 फीसदी निम्र मध्यमवर्ग के कामगार

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श्रावस्ती। बहुत परेशानियों का सामना कर के घर वापसी करने वाले प्रवासी मजदूरों की दिक्कतें कम नहीं हो रही है। अब उनके सामने रोजगार की समस्या खड़ी होने लगी है। सबसे ज्यादा तकलीफ निम्न मध्यम वर्गीय प्रवासी मजदूरों को है जो महानगरों में फैक्ट्री या फिर अन्य हल्के काम करके 20-25 हजार रुपये कमाकर अपने परिवार का भरण पोषण कर लेते थे।
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गांव वापसी के बाद यहां केवल मनरेगा में ही उन्हें रोजगार का अवसर दिखाई दे रहा है। इस कार्य की उन्हें आदत नहीं है। वैसे ही मनरेगा में रोजगार का एक सीमित अवसर सीमित समय के लिए है। बरसात शुरू होते ही मनरेगा में कार्य का अवसर भी समाप्त हो जाएगा। ऐसे में इन प्रवासी मजदूरों के सामने पुन: महानगरों की ओर वापसी का विकल्प शेष है।
वहीं जिले में कोई भी उद्योग धंधा नहीं है। जो भी कुटीर व ग्रामोद्योग चल रहे हैं। उनमें से अधिकांश कागजी हैं। इसलिए रोजगार का अवसर केवल ग्रामीण क्षेत्रों में चलने वाले मनरेगा में ही उपलब्ध है। लेकिन क्वारंटीन अवधि पूरा होने के बाद वहां भी काम की किल्लत होगी।
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देखा जाए तो जिले में मनरेगा योजना के तहत अब तक एक लाख 31 हजार 221 श्रमिक पंजीकृत हैं। इसमें लगभग 7,200 वह प्रवासी श्रमिक भी शामिल हैं। जिन्होंने घर वापसी के बाद मनरेगा में अपना जॉबकार्ड बनवा लिया। इनमें से मौजूदा समय में ग्राम पंचायतों में संचालित 750 वर्क साइट पर लगभग 32 हजार श्रमिक नियोजित हैं।
ऐसे में देखा जाए तो लगभग एक लाख से कुछ कम मजदूरों के पास अभी से मनेरगा में काम नहीं है। ऊपर से 45 हजार 787 प्रवासी मजदूर जिले में पहुंच चुके हैं। इनमें से 37,540 जो अभी होम क्वारंटीन में हे। जिनकी अवधि पूरी होने के बाद जिले में कुल मजदूर जिसमें मनरेगा व प्रवासी शामिल होंगे। वह लगभग डेढ़ लाख से अधिक पहुंच जाएगी। जिन्हें काम की जरूरत होगी।
उधर घर वापसी करने वाले प्रवासी मजदूरों में 48 फीसदी ऐसे निम्न मध्यम वर्गीय प्रवासी मजदूर हैं जो महानगरों में किसी फैक्ट्री, दुकान, एजेंसी, सिलाई के कारखाने आदि में काम करके अपना जीविकोपार्जन करते थे। इनमें से कई तो ऐसे हैं जो कुछ पढ़े लिखे होने के कारण महानगरों में सेल्स मैन या कुछ इसी तरह का काम करते थे।
इनकी घर वापसी हुई है। लेकिन यह मनरेगा में फावड़ा चला कर अपना जीविकोपार्जन नहीं कर पाएंगे। ऐसे में ही होम क्वारंटीन पूरा करने वाले राकेश कुमार ने बताया कि मुंबई में वह होटलों में खाद्यान्न आपूर्ति का काम करता था। वहां से वापस आया अब यहां घर में कुछ काम नहीं है। जो घर में खाद्यान्न व पैसा था वह भी खत्म होने वाला है। यदि उसके लायक कोई काम न मिला तो बाहर जाना उसकी मजबूरी है।
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