जेतवन परिसर का भ्रमण करते अनुयायी।- संवाद
कटरा। श्रीलंका के 30 अनुयायियों का दल शनिवार को बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती पहुंचा। सभी ने बौद्ध भिक्षु माता सुमेधा थेरो के नेतृत्व में पारंपरिक रीति-रिवाज से गंधकुटी में पूजा-अर्चना की। इस दौरान बौद्ध सभा का भी आयोजन किया गया।
बौद्ध सभा को संबोधित करते हुए माता सुमेधा ने कहा कि भगवान बुद्ध के श्रावस्ती प्रवास के लिए व्यापारी अनाथपिंडक ने जेतवन की भूमि राजा प्रसेनजित के बेटे जेत से खरीदी थी। उन्होंने स्वर्ण मुद्राएं बिछाकर 18 एकड़ जमीन को खरीदा था। भगवान बुद्ध के लिए जमीन खरीदे जाने की जानकारी होने के बाद राजा ने मुद्राएं वापस कर दी थीं।
उन्हीं स्वर्ण मुद्राओं से जेतवन महाविहार का विकास किया गया। इस विहार का नाम राजा के पुत्र जेत के नाम पर जेतवन रखा गया। इसी जेतवन महाविहार में पवित्र आनंद बोधि वृक्ष व बुद्ध का आवास गंधकुटी भी स्थित है।
माता सुमेधा ने आगे कहा कि भगवान बुद्ध ने 24 वर्षावास इसी जेतवन में बिताए। इसी स्थान पर सर्वाधिक उपदेश देने के कारण जेतवन बौद्ध धर्मावलंबियों की आस्था का केंद्र है। श्रावस्ती आने वाले तीर्थयात्री इसी वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान-साधना व दीप प्रज्ज्वलित कर पूजा-अर्चना करते हैं।
श्रावस्ती आने वाले बौद्ध मतावलंबी गंधकुटी पर भी पुष्पों से सजाकर दीप प्रज्ज्वलित कर पूजा-अर्चना करते हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण व जापान के कांसाई विश्वविद्यालय की संयुक्त टीम ने वर्ष 1998 में जेतवन में उत्खनन किया। इसमें 2600 वर्ष पुराने नगर के अवशेष पाए गए। यहां बुद्ध की प्राचीन मूर्ति, स्तूप मंदिर व विहारों के अवशेष ताम्र पत्र आदि भी मिले हैं।