बोधि वृक्ष की पूजा करते थाईलैंड के अनुयायी।
- फोटो : बोधि वृक्ष की पूजा करते थाईलैंड के अनुयायी।
कटरा। बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती में मंगलवार को थाईलैंड से आए अनुयायियों के 60 सदस्यीय दल से गुलजार रही। सभी अनुयायियों ने बौद्ध भिक्षु भवरानंद के नेतृत्व में पारंपरिक तरीके से बोधि वृक्ष का दर्शन-पूजन किया। इस दौरान बौद्ध सभा का आयोजन भी किया गया।
बौद्ध सभा संबोधित करते भंवरानंद ने कहा कि महात्मा बुद्ध का जन्म नेपाल की तराई में स्थित लुम्बिनी में 563 ईसा पूर्व वैशाख पूर्णिमा के दिन हुआ था। युवावस्था में उन्होंने मानव जीवन के दुखों, रोग, वृद्धावस्था व मृत्यु को देखा और एक प्रसन्नचित्त संन्यासी से प्रभावित होकर गृह त्याग दिया। 528 ईसा पूर्व वैशाख पूर्णिमा के दिन बोधगया में एक पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान करते हुए आत्मबोध प्राप्त किया। वहीं, इसी दिन 483 ईसा पूर्व कुशीनारा में उन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ।
बुद्ध की मृत्यु के बाद उनके शिष्यों ने राजगृह में एक परिषद बुलाई, जहां बौद्ध धर्म की मुख्य शिक्षाओं को संहिताबद्ध किया गया। इन शिक्षाओं को पिटकों के रूप में व्यवस्थित करने के लिए चार बौद्ध संगीतियों का आयोजन किया गया, जिसके बाद तीन मुख्य पिटक बने। जिनमें विनय पिटक (बौद्ध अनुयायियों के लिए व्यवस्था के नियम), सुत पिटक (बुद्ध के उपदेश सिद्धांत) और अभिधम्म पिटक (बौद्ध दर्शन) हैं। इन सभी को संयुक्त रूप से त्रिपिटक कहा जाता है और इन्हें पाली भाषा में लिखा गया है।