शामली। नगर निकाय चुनाव सीमित खर्चों पर लड़ा जाता था। प्रत्याशी की पृष्ठभूमि और उसकी साफ छवि को देखकर ही मतदाता चयन करते थे। अब हालात बदल गए हैं। राजनीति में भी चकाचौंध हो गई है। यह कहना है पालिका परिषद शामली के सबसे पहले चेयरमैन रहे लाला गेंदामल के पौत्र सतीश चंद का।
आजादी के बाद पहली बार 1950 से 1953 तक लाला गेंदामल शामली में चेयरमैन रहे। लाला गेंदा मल की राजनीतिक विरासत को उनके पौत्र रमेशचंद गुप्ता ने वर्ष 1971 में नगर पालिका परिषद चेयरमैन बनकर आगे बढ़ाया। फिर रमेश चंद के पुत्र विशाल गुप्ता तीन बार पालिका के सभासद रहे, लेकिन उसके बाद इस परिवार ने सक्रिय राजनीति से किनारा कर लिया।
लाला गेंदामल के पौत्र सतीशचंद गुप्ता ने बताया कि शामली पालिका परिषद शामली में पूर्व में 17 वार्ड सदस्य होते थे। पहले सदस्य ही वरीयता के आधार पर चेयरमैन को चुनते थे। प्रत्याशी के घराने की छवि के आधार पर दूसरे प्रत्याशी चुनाव मैदान में नहीं आते थे। सर्वदलीय प्रत्याशी होने के कारण निर्विरोध चुन लिया जाता था।
प्रत्याशी व उनके समर्थक घर- घर जाकर वोट मांगते थे। चुनाव कार्यालय भी खोला जाता था और लाउडस्पीकर, ब्लैक एंड व्हाइट पोस्टर, बैनर से प्रचार किया जाता था। वर्तमान माहौल की तरह तब इतना ताम झाम नहीं होता था। सादगी से नेता वोट मांगते थे और विपक्षी नेताओं का भी सम्मान होता था, तब महज सात से 10 हजार रुपये तक ही चुनाव खर्च हो पाता था।
1956 में अस्तित्व में आई शामली नगर पालिका
शामली। शहर के मोहल्ला शिवगंज मंडी में नगर पंचायत का कार्यालय संचालित होता था। 15 मार्च 1954 में शामली नगर पालिका परिषद कार्यालय का शिलान्यास मिल रोड पर खाद्य रसद एवं स्वास्थ्य मंत्री रहे चंद्रभान गुप्ता ने किया था। वर्ष 1956 में शामली नगर पालिका परिषद के चेयरमैन लाला सलेकचंद संगल के कार्यकाल में शामली नगर पालिका परिषद के कार्यालय का उद्घाटन 3 फरवरी 1956 उत्तर प्रदेश रो स्वायत शासन के मंत्री सैयद अली द्वारा किया गया था।