शास्त्रीय संगीत की बेमिसाल धरोहर है किराना घराना
कैराना (शामली)। दानवीर कर्ण की नगरी आज भी संगीत के क्षेत्र में देश विदेश में प्रसिद्ध है। शास्त्रीय संगीत के लिए प्रसिद्ध किराना (कैराना) घराना ने देश ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में कैराना को शोहरत दिलाई। इस घराने की धरोहरों ने शास्त्रीय संगीत के जरिए कैराना को पूजनीय बना दिया। मशहूर संगीतज्ञों ने सुर, लय और ताल के साथ शास्त्रीय संगीत की जो शोहरत दिलाई है, वह बेमिसाल है।
कैराना कस्बा निवासी वृद्ध शायर रियासत अली ताबिस ने बताया कि किराना घराना के जनक अब्दुल करीम खां कैराना में 11 नवंबर 1872 को काले खां के घर पैदा हुए थे। अब्दुल करीम खां ने अपने पिता और चाचा से शास्त्रीय संगीत का ककहरा सीखा था। अब्दुल करीम खां बाद में बडौदा एंड मैसूर कोर्ट में म्यूजिशियन के पद पर नियुक्त हुए थे। अब्दुल करीम खां को सारंगी, वीणा, सितार और तबला में महारथ हासिल थी। किराना घराना का नाम देश विदेश में आगे बढ़ता गया। अब्दुल करीम खां की कामयाबी का ही कारण था कि एचएमवी के ग्रामोफोन रिकार्डर वाले स्टीकर पर भी उनके कुत्ते का फोटो छपवाया गया था।
---- किराना घराना के सितारे
किराना घराना में गनापत बुआ, वाहिद खान, सवाई गंधर्व, सुरेशबाबू माणे, रोशनआरा बेगम, हीराबाई बरोडकर, मल्लिकार्जुन मैसूर, गंगूबाई हंगल, भीमसैन जोशी, प्रभा आत्रे, तथा श्रीकांत देशपांडे शास्त्रीय संगीत में अमिट छाप छोड़ चुके हैं। गंगूबाई हंगल को 1971 में पदम भूषण, 1973 में संगीत नाटक एकेडमी और 2002 में पदम विभूषण से नवाजा गया था।
---- कैराना में आकर मन्ना डे ने उतार लिए थे जूते
मशहूर संगीतकार मन्ना डे पूर्व में एक कार्यक्रम में शामिल होने कैराना आए थे तो, कैराना की सीमा प्रारम्भ होने से पहले ही अपने जूते उतार कर हाथों में ले लिए। लोगों ने जब कारण पूछा तो मन्ना डे ने कहा कि यह धरती महान संगीतकार की है। इस धरती पर मैं जूते पहनकर नहीं चल सकता। कैराना के छड़ियान मैदान पर जहां उनका कार्यक्रम हुआ था, उसे आज भी मन्ना डे स्टेज के नाम से जाना जाता है।
फाइल फोटो- पण्डित नेहरू के साथ किराना घराना के संगीतकार- फोटो : SHAMLI