शामली। 45 मिनट तक लगातार बोलने के बाद गले को आराम देना चाहिए। लंबे समय तक बोलने से गला खराब हो सकता है। गला खराब होने से आवाज निकलनी बंद हो सकती है, इसलिए बोलते समय अपने गले का भी ख्याल रखना चाहिए। चिकित्सक भी सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं। चिकित्सकों का कहना है कि लंबे समय तक बोलने से बचना चाहिए। इससे गले में थकान होती है, जिसकी वजह से से गला खराब हो सकता है। इसमें लापरवाही भारी पड़ सकती है।
लोकसभा चुनाव के पहले चरण में 19 अप्रैल को मतदान होना है। जिले में पहले चरण में मतदान के लिए अब सिर्फ पांच दिन ही बचे हैं। समय कम रहने के कारण चुनाव में प्रत्याशियों व अन्य नेताओं की चुनावी भागदौड़ ज्यादा हो गई है। चुनावी माहौल में अक्सर देखने में आ रहा है कि नेता लगातार बोलते जा रहे हैं। कहीं-कहीं पर तो एक घंटे से ज्यादा समय तक लगातार भाषण दे रहे हैं। ऐसी स्थिति में शरीर में थकान के साथ गला खराब होने का खतरा रहता है। चिकित्सकों का कहना है कि ज्यादा लंबे समय तक लगातार नहीं बोलना चाहिए। इसे बीच-बीच में आराम देना चाहिए। फिजिशियन डॉ. पंकज गर्ग ने बताया कि गले में स्वर यंत्र के अंदर वोकल कोड होते हैं, जो आवाज को पतला या मोटा करते हैं। लगातार बोलने में वोकल कोड में दाने बनने की आशंका रहती है, जिससे गला खराब हो जाता है। गले में सूजन व दुखन हो सकती है। आवाज भारी हो जाती है या बहुत कम निकलती है। ऐसी स्थिति में देखा जाता है कि व्यक्ति तेज बोलना चाहता है, लेकिन गले से आवाज बहुत हल्की निकलती है। वैसे तो बोलने की कोई लिमिट नहीं है, लेकिन गले को स्वस्थ रखने के लिए बेहतर यही है कि 20-25 मिनट से ज्यादा लगातार नहीं बोलना चाहिए, अगर ज्यादा बोलना जरूरी है तो 45 मिनट बाद गले को आराम अवश्य दें। गला सूखने पर बीच-बीच में पानी पीते रहना चाहिए। इसके साथ ही शरीर की थकान मिटाने के लिए छह से आठ घंटे की नींद जरूरी है। जिला अस्पताल के वरिष्ठ परामर्शदाता डॉ. अशोक कुमार का कहना है कि आवाज निकालने के लिए गले में वोकल कोड होते हैं। लंबे समय तक बोलने से आवाज भरभरा जाती है या कम हो जाती है। इसलिए जरूरी है कि गले को स्वस्थ रखने के लिए बीच-बीच में गले को आराम देना चाहिए।
लंबे समय तक बोलने से सुनने वाले पर भी पड़ता है असर
डॉ. पंकज गर्ग का कहना है कि अगर कोई लंबे समय तक रेक्चर देता है तो इसका असर बोलने वाले के साथ ही सुनने वाले पर भी पड़ता है। सुनने वाले व्यक्ति का ध्यान 20-25 मिनट तक तो स्थिर रहता है, लेकिन उसके बाद उसकी सुनने की रुचि और क्षमता दोनों कम होने लगती है। स्कूल-कॉलेजों में लेक्चर का समय एक घंटे से कम का ही होता है। इसलिए जरूरी है कि कम समय तक बोलना व सुनना बेहतर होता है।