इसके बाद भी हिम्मत नहीं हारी और बायोफ्लॉक विधि से मछली पालन शुरू किया। अब हर छह माह में दो से लेकर तीन लाख रुपये तक की आमदनी आसानी से की जा रही है। तीन अन्य को भी रोजगार दिया हुआ है। उनके अनुसार, सुबह और शाम रसोई संभालती हूं। बचे समय में मछली पालन किया जाता है।
इसके अलावा गांव की ही सुनीता देवी पत्नी नरेश कुमार भी तीन साल से बायोफ्लाॅक विधि से मछली पालन कर मुनाफा कमा रही हैं। सुनीता के पति नरेश कुमार किसान हैं और पत्नी का मछली पालन में सहयोग करते हैं। बताया कि मछली तैयार करने के बाद दिल्ली की मंडी में भेजी जाती है। अन्य लोगों को भी निशुल्क मछली पालन के टिप्स दिए जा रहे हैं।
मुख्यमंत्री के आर्थिक सलाहकार डॉ. केवी राजू और मत्सय पालन विभाग के सहायक निदेशक राजेलाल भी मत्सय पालन करने वाली महिलाओं की सराहना कर चुके हैं। महिला किसानों को सम्मानित भी किया जा चुका है।
जिले में नहीं है मछली मंडी, दिल्ली होती है मछलियों की सप्लाई
किसान श्यामो देवी और सुनीता का कहना है कि शामली में मछली मंडी नहीं है, जिसके कारण यहां पर पाली गई मछलियों को ठेकेदार के माध्यम से दिल्ली भेजा जाता है। यदि शामली में मछली मंडी शुरू करा दी जाए तो यहां पर मछली पालकों की संख्या बढ़ेंगी, वहीं कम जमीन वाले किसान अधिक मुनाफा ले सकेंगे।
किसानों को किया जा रहा जागरूक
मत्सय पालन विभाग के सहायक निदेशक राजेलाल का कहना है कि मछली पालने वाले किसानों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। किसानों को विभिन्न गांव-गांव में जाकर जागरूक भी किया जा रहा है।
जानिए.. कैसे होता है बायोफ्लाॅक विधि से मछली पालन
राजेलाल के अनुसार, बायोफ्लॉक तकनीक में बायोफ्लॉक नाम के एक बैक्टीरिया का इस्तेमाल किया जाता है। इस तकनीक में सबसे पहले मछलियों को सीमेंट या मोटे पॉलिथीन से बने टैंक में डाला जाता है। फिर मछलियों को खाना दिया जाता है। मछलियां जितना खाना खाती हैं, उसका 75 प्रतिशत मल के रूप में शरीर से बाहर निकाल देती हैं। फिर बायोफ्लॉक बैक्टीरिया इस मल को प्रोटीन में बदलने का काम करता है। जिसे मछलियां खा जाती हैं। जिससे उनका विकास बहुत तेजी से होता है।
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बायोफ्लॉक तकनीक के फायदे, किसान श्यामो देवी के अनुसार...
काम लागत, सीमित जगह एवं अधिक उत्पादन।
चार महीने में केवल एक ही बार पानी भरा जाता है।
गंदगी जमा होने पर सिर्फ 10% पानी निकालकर इसे साफ रखा जा सकता है।
अनुउपयोगी जगह एवं कम पानी का उपयोग।
मजदूरों की लागत कम।