मौलाना हजरत इफ्तेखार उल हसन के इंतकाल की खबर सुनकर रविवार रात को ही देश भर से उनके मुरीद लोग कांधला पहुंचने लगे थे। कोई बस से पहुंचा, तो कोई ट्रेन से। रात जैसे तैसे इधर उधर बैठकर काटी। सोमवार सुबह कांधला कस्बे की सड़कें हजरत मौलाना के मुरीदों से भरी थी। सब उनकी एक झलक पाने को बेताब थे। यह मौलाना हजरत इफ्तेखार उल हसन का सम्मान ही था कि कोई दीवार पर चढ़कर उनके दीदार कर रहा, तो कुछ लोग तो पानी की टंकी पर ही चढ़ गए। लोगों के दिलों में गम था और आंखें नम थीं। उनके नजदीकी रहे लोगों की जुबां पर हजरत साहब की यादें थीं।
खुदा से इतनी मोहब्बत करो...
हाजी अब्दुल अजीज ने बताया कि हजरत साहब की नसीहत में सफलता का राज छिपा होता था। उन्हें याद है जब किसी मसले पर उन्होंने कहा था कि खुद से इतनी मोहब्बत करो जितनी धोबी कपड़े से करता है। उन्होंने इसका मतलब पूछा तो उन्होंने राजा के कपड़े प्रेस करने वाले की कहानी सुनाईं थी। बताया कि खुदा की इबादत में ही सब खुशी और तरक्की है। दूसरे धर्म के लोगों से भी प्रेमभाव का संदेश वे देते थे।
कांधला में नहीं बिगडने दिया सांप्रदायिक सौहार्द
दिल्ली से आए मौ.इस्तखार ने बताया कि हजरत साहब ने हमेशा दीन धर्म के लिए काम किया। वे हर धर्म समाज को समान देखते थे। कांधला में भी उन्होंने हमेशा भाईचारे का पैगाम दिया। यही वजह है कि मेरठ समेत कई जगह दंगे हुए, लेकिन कांधला के हिंदूू मुस्लिम हमेशा आपस में मिलजुलकर रहे। मेरठ और मुजफ्फरनगर दंगों के वक्त भी हजरत साहब ने दुआ की। उसी का नतीजा रहा कि दंगों में इस इलाके को कभी नुकसान नहीं पहुंचा।
हिंदी में अनुवाद किए थे कुरान शरीफ के सिफारे
हजरत साहब के जनाजे में आए दिल्ली जामिया इस्लामियां के प्रधानाचार्य रहे शाहिद हुसैन के बेटे हाफिज खालिद ने बताया कि हजरत साहब उनके अब्बू के मित्र रहे हैं। अपने अब्बू के साथ कई बार उनसे मिले। बताया कि इफ्तेखार उल हसन ने कुरान शरीफ के 11 सिफारे संस्कृत से हिंदी में अनुवाद किया था। जब भी वो अब्बू के साथ उनसे मिलते, उनकी नसीहतों से वे प्रभावित हुए। हजरत साहब से 2009 में मुलाकात हुई थी, उनके इंतकाल की खबर सुनकर रुका नहीं गया।
हजरत साहब को बनाया था हाजियों का आमिर
खतौली निवासी मौ.अनस ने बताया कि हजरत साहब के बारे में उनके बुजुर्गों ने बताया कि सालों पहले जब हज के लिए कश्ती (पानी के जहाज) से जमात गई थी। उसमें पाकिस्तान समेत कई मुल्क के बड़े बड़े मौलाना, शेख थे। मगर इस जमात का आमिर (मुखिया) हजरत साहब को बनाया गया था।
तकलीफ कितनी भी हो, रास्ता इमानदारी का चुनो
कांधला आए दिल्ली में फार्मेसिस्ट बदर हसन सिद्दीकी ने बताया कि उनका ननिहाल कांधला में है। वे जब भी परिवार के साथ कांधला आते थे। अपने नाना, मामा के साथ हजरत साहब के प्यार और दुआओं के लिए उनसे जरूर मिलते थे। कई बार वे रोजगार में चल रही तकलीफ में भी उनसे मिले। उन्होंने हमेशा एक ही नसीहत दी कि तकलीफ चाहे कितनी बड़ी हो, ईमानदारी का रास्ता मत छोड़ना। हमेशा सीधे ओर ईमानदारी के रास्ते पर चलने की सीख दी। उनकी नसीहत का असर है कि आज उनका कारोबार, परिवार सब खुशहाल है।
खुर्जा के बड़े मदरसे की नींव रखी
बुलंदशहर के खुर्जा से आए हाजी अब्दुल अजीज ने बताया कि वह हजरत साहब से 50 साल से संपर्क में हैं। उनकी मुलाकात जमात के दौरान हुई थी। उन्होंने हमेशा दीन इमान की बातें कीं। दीन के लिए वे सब कुछ कुर्बान करने को तैयार रहते थे। उन्होंने ही खुर्जा के ईदगाह रोड स्थित बडे़ मदरसे की नींव रखी थी।