शामली। एक हादसे से फिरदोस की जिंदगी में अंधकार छा गया था। परिवार की माली हालत ठीक नहीं होने के कारण फिरदोस को अपनी जिंदगी संवारने के लिए पहाड़ जैसी मुसीबतों से भी मुकाबला करना पड़ा।
इसके बावजूद हौसला बुलंद होने के कारण फिरदोस ने अपने सपनों को मुकाम तक पहुंचाने के लिए प्रयास शुरू किया। इस प्रयास में उसे कामयाबी भी मिली। उसने राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान से दसवीं की परीक्षा 70 प्रतिशत अंकों के साथ पास कर ली।
मोहल्ला नई बस्ती कलंदर शाह में नूरानी मस्जिद के पास रहने वाले नूरहसन मलिक फिलहाल फेरी लगाकर कपड़े बेचते हैं। उनकी बेटी फिरदोस (17 ) जब 10 साल की थी, तब नूर हसन मलिक किराए की दुकान में केमिकल (एसिड) बेचने का कार्य करते थे। एक दिन खेलते समय फिरदोस के ऊपर एसिड गिर गया था।
हादसे में फिरदोस का चेहरा बुरी तरह झुलस गया था और आंखों की रोशनी चली गई थी। इसके बाद परिवार के लोगों ने फिरदोस का उपचार कराया। बेटी के उपचार में काफी खर्च होने के कारण नूर हसन को दुकान भी बंद करनी पड़ गई। इसके बाद नूर हसन फेरी लगाकर कपड़े बेचने लगे। इसी दौरान फिरदोस ने पढ़ाई करने में दिलचस्पी दिखाई और परिवार के लोगों से ब्रेल लिपि के जरिये पढ़ने की इच्छा जताई।
फिरदोस ने बताया कि मुजफ्फरनगर के मोहल्ला लद्दावाला निवासी रिश्तेदार रानू मलिक ने इस कार्य में उसकी मदद की और राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (एनआईओएस) में दाखिला करा दिया।
करीब एक साल के लिए वह दिल्ली के रोहिणी स्थित हॉस्टल में भी रही, जहां उसने कंप्यूटर का ज्ञान लिया। इसी दौरान उसने दसवीं कक्षा के लिए परीक्षा दी, जिसमें हिंदी, अंग्रेजी, गृहविज्ञान, सामाजिक विज्ञान और डाटा एंट्री विषय के साथ परीक्षा दी। बीते सप्ताह ही उसका रिजल्ट घोषित हुआ, जिसमें फिरदोस 70 प्रतिशत अंक पाकर उत्तीर्ण हो गई।
मेहनत करके सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनूंगी
फिरदोस का जज्बा सलाम करने के काबिल है। उसने बताया कि वह देख नहीं सकती तो क्या हुआ, मगर परिवार पर बोझ भी नहीं बनना चाहती। परिवार में दो भाई हैं, जिनमें आशू बड़ा और दानिश छोटा है। मां रोशनी नाज और पिता नूर हसन अशिक्षित हैं। उसका कहना है कि सपना सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनना है, जिसके लिए कंप्यूटर साइंस में ग्रेजुएशन की पढ़ाई भी करूंगी।