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19 माह की एमरजेंसी के याद आते ही कांप उठता है उनका शरीर

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19 माह की इमरजेंसी याद कर कांप जाते हैं लोग
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शामली। 25 जून 1975 को इमरजेंसी लागू होते ही युवाओं की धरपकड़ शुरू हो गई। जिले में इसके खिलाफ बगावत शुरू हो गई। आवाज उठाने वाले 40 युवाओं को जेल में डाल दिया गया। लोकतंत्र सेनानी आज भी उस दौर को याद कर कांप जाते हैं।
शामली जिले के नाला गांव कृष्ण बंधु, शक्ति सिंह, कांधला के गौरीशंकर मित्तल, राजेंद्र विदुर, उदयवीर एलम ने इमरजेंसी में आवाज बुलंद की। लोकतंत्र सेनानी संघ के अध्यक्ष कृष्ण बंधु बताते हैं कि वह आईपीएस की तैयारी कर रहे थे, लेकिन तभी इमरजेंसी में हुए सत्याग्रह में कूद गए थे। उनकी पहली गिरफ्तारी अक्तूबर 1975 में एलम इंटर कालेज से जिले के कांग्रेस के एक नेता के इशारे पर हुई। कृष्ण बंधु का कहना है कि उनके भाई संजय गांधी के शेडो थे, उनके कहने पर उनकी रिहाई हुई थी। जिला प्रशासन की रिपोर्ट पर उनके भाई इकबाल सिंह को शेडो पद से हटा दिया गया था। उनका कहना है कि दूसरी बार गिरफ्तारी कांधला एसएचओ द्वारा की गई। उन्हें थाने में बेरहमी से पीटा गया। पुलिस की पिटाई के बाद वह बेहोश तक हो गए थे।
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कांधला के लोकतंत्र सेनानी गौरीशंकर मित्तल बताते हैं कि इमरजेंसी में 9 दिसंबर 1975 को मुजफ्फरनगर बस अड्डे पर युवाओं द्वारा सत्याग्रह किया गया। सरकार की दमनकारी नीति के विरोध में शामली जिले के 40 युवा गिरफ्तार किए गए थे। इमरजेंसी में पुलिस की बर्बरता की याद आते ही वह कांप उठते है।
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- भाजपा सरकार ने की पेंशन 20 हजार
लोकतंत्र सेनानी शक्ति सिंह बताते हैं कि मुलायम सरकार ने इमरजेंसी में संघर्ष करने वालों को लोकतंत्र सेनानी का दर्जा देेते हुए 500 रुपये मासिक पेंशन शुरू कराई थी। प्रदेश में भाजपा सरकार बनने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लोकतंत्र सेनानियों की पेंशन 20 हजार रुपये कर दी, जिससे अब लोकतंत्र सेनानियों के सामने किसी तरह की आर्थिक दिक्कत नहीं है।
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