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फसलों के लिए फिर खतरा बनेगा मामौर झील

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फसलों के लिए फिर खतरा बनेगा मामौर झील
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शामली/कैराना। मानसून के दस्तक देेने के बावजूद भी अभी तक मामौर झील का सुधार नहीं हो सका। इस झील पर प्रस्तावित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) अभी टेंडर प्रक्रिया में फंसा हुआ है। बरसात के मौसम में झील के टूटने से गंदा पानी आसपास की हजारों बीघा फसल में भर जाता है। गांव में भी पानी भर जाता है। इससे फसलों के साथ आबादी को भी नुकसान होता है। बारिश के मौसम में भी तो झील अक्सर टूटती रहती है।
करीब 40 हेक्टेयर में फैली मामौर झील में कैराना के बड़े नाले का पानी जाता है। साथ ही इससे जुड़े एक तालाब का पानी भी नदी में आता है। इससे बरसात के दिनों में झील ओवरफ्लो होकर आसपास की सैकड़ों बीघा फसल जलमग्न कर देती है। साथ ही गंदा पानी आबादी क्षेत्र में भी घुस जाता है। इससे ग्रामीणों के मकान भी क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। झील के सुधार के लिए यहां करीब 70 करोड़ की लागत से सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट प्रस्तावित है, लेकिन यह टेंडर प्रक्रिया से ही बाहर नहीं निकला है। नमामि गंगे के तहत झील के विकास की योजना तैयार की गई थी तथा एसटीपी का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया था। मंजूरी के बाद लखनऊ स्तर से प्लांट की टेंडर प्रक्रिया चल रही है।
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वेटलैंड के रूप में किया जाना था विकसित
सहारनपुर के तत्कालीन मंडलायुक्त संजय कुमार ने मामौर झील को वेटलैंड के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव तैयार कराया था। यदि झील का पानी साफ रहे तो यहां जैव विविधता के विकास की संभावनाएं हैं। मुजफ्फरनगर-बिजनौर सीमा पर स्थित हैदरपुर वेटलैंड की तरह ही यहां पर भी विदेशी पक्षियों का आना शुरू हो सकता है, लेकिन जब तक झील में प्रदूषण है तब तक इसका वेटलैंड के रूप में विकास संभव नहीं।
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इन्होंने कहा...
मामौर झील पर एसटीपी निर्माण का टेंडर प्रक्रिया में हैं। टेंडर प्रक्रिया लखनऊ स्तर से हो रही है। यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद एसटीपी का निर्माण शुरू होगा।
- आरके जैन, अधिशासी अभियंता जल निगम।
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