फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कैराना के सच से वाकिफ रहे ब्यूरोक्रेट्स

Thu, 16 Jun 2016 12:35 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, शामली
विज्ञापन
Kairana drain case - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
विज्ञापन
कैराना। पलायन पर सियासत के दावे कुछ भी हों, लेकिन सूबे की ब्यूरोक्रेसी दो दशक पहले से कैराना के सच से वाकिफ रही है। कुंद हो चुकी कानून व्यवस्था और पसरे खौफ ने अपना घर छोडने पर मजबूर कर दिया। तत्कालीन डीएम विनोद शंकर चौबे ने बाकायदा शासन को गोपनीय रिपोर्ट भेजी थी, जिसमें एक जाति और धर्म विशेष के अफसरों की जिले में तैनाती नहीं करने तक के लिए कह दिया था। खौफ के संदर्भ में ऐसा ही इशारा पूर्व डीएम एसपी सिंह भी कर चुके हैं। 
विज्ञापन


कैराना का लावा भले ही अब फूटा हो, मगर जमीनी हकीकत से अफसर पहले भी अनभिज्ञ नहीं रहे हैं। शामली जब पृथक जिला नहीं था। मुख्यालय से कैराना की दूरी 50 किलोमीटर से ज्यादा रही। यही वजह है कि तहसील होने के बावजूद भी डीएम और एसएसपी के लिए कैराना के लॉ एंड ऑर्डर को बनाए रखना चुनौती बना रहा।  नकली नोट, हथियारों की तस्करी से लेकर रंगदारी, हत्या, दुष्कर्म, अवैध कब्जे और अन्य संगीन अपराधों ने यहां के जनजीवन को तबाह कर दिया।

यहां अपराधियों को सियासत की पनाह मिलती रही। कृषि आधारित इस इलाके में अपराध के बाद जरायम के कारिंदे हरियाणा के पानीपत, करनाल, सोनीपत और कुरुक्षेत्र में छिपते रहे हैं। कुख्यात मुकीम काला के गुर्गों की इन्हीं शहरों से हुई गिरफ्तारी बात को पुख्ता करती है। पुलिस प्रशासन ने कैराना की हकीकत पर परदा डालते हुए सियासतदाओं की चाकरी में ही नौकरी गुजार दी। शासन तक कभी कैराना का सच पहुंच नहीं पाया।
विज्ञापन


तत्कालीन डीएम विनोद शंकर चौबे ने हिम्मत की तो सूबे में बवाल खड़ा हो गया। फरवरी 1999 में चौबे ने शासन को एक गोपनीय रिपोर्ट भेजी, जिसमें जिले की कानून व्यवस्था के लिए एक जाति और विशेष धर्म के अफसरों एवं पुलिस कर्मियों की तैनाती नहीं करने के लिए कहा। 
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें