ऊन। कस्बे में होली के त्योहार की न तो पहले जैसी तैयारी रही और न ही कोई पहले जैसी धूम रही। पहले होली से 15 दिन पहले ही महिलाएं और पुरुष अलग-अलग टोलियां बनाकर शाम से ही देर रात तक होली के गीत गाया करते थे।
कस्बा ऊन की मोहल्ला घांटी निवासी लक्ष्मी देवी कहती है कि करीब चार दशक पहले तक होली से 15 दिन पहले ही मोहल्ले की महिलाएं इकट्ठा होकर शाम से आधी रात तक होली के गीत गाया करती थी। दुल्हैंडी के दिन लोग एक दूसरे पर रंग गुलाल डालकर मस्ती से त्योहार मनाते थे। उस समय होली पर रंग लगाते थे और गले लगाकर सारे गिले शिकवे दूर हो जाते थे। बुजुर्ग प्रकाशपाल का कहना है कि उनके समय की होली पूरी मस्ती भरी होती थी। कोई भी रंग लगवाने या खेलने में परहेज नहीं करता था और ना ही कोई रंग डालने पर बुरा मानता था। होली मनाने का वह अंदाज आज भी उन्हें याद है। मैं होली कैसे खेलूंगी सांवरिया के संग, कोरे-कोरे कलश मंगाई उसमें होली के रंग कान्हा संग खेलूंगी मैं तो होली... आदि जैसे गीत गाया करती थी। दुल्हैंडी के दिन सभी परंपरागत ढंग से एक दूसरे को गुलाल लगाकर गले लगाते थे, जो अब पुरानी यादें और किस्से बनकर रही गई। त्योहारों की परंपरा सिमटती जा रही है। होली पर कोरोना वायरस को लेकर भी लोग रंग गुलाल से बचते दिखाई दे रहे हैं। मोहल्ला आर्यपुरी निवासी मेघवती का कहना है कि हमारे समय में होली के गीत त्योहार की रौनक हुआ करते थे। साथ ही उस समय की गुजिया का स्वाद का भी अलग ही आनंद था।