झिंझाना। जननी सुरक्षा योजना के तहत जच्चा-बच्चा की सेहत के लिए सरकार की ओर से अरबों रुपये खर्च किए जा रहे है। मगर, धरातल पर इस बजट का गोलमाल हो रहा है। सीएचसी झिंझाना के हालात को कुछ ऐसी ही कहानी बयां करते है। यहां जच्चा को न तो खाने को भोजन दिया जा रहा है और न कई अन्य सुविधाएं मयस्सर है। सब कागजों में हो रहा है।
झिंझाना सीएचसी पर प्रति माह लगभग 140 महिलाएं प्रसव कराने के लिये भर्ती होती है। जिनके लिए बकायदा हर माह निशुल्क भोजन की व्यवस्था सरकार द्वारा की जाती है। किसी समय क्या देना है, इसके लिए बकायदा मेन्यू निर्धारित किया गया है। मगर, झिंझाना अस्पताल में मेन्यू के अनुसार भोजन देने की बात तो दूर किसी भी जच्चा को खाना नहीं दिया जाता। अधिकांश महिलाओं के परिजन घर से भोजन या दलिया आदि बनाकर लाते है।
शनिवार को अमर उजाला टीम ने सीएचसी पहुंची तो कुछ ऐसे ही हालात यहां भर्ती जच्चा और उनके तीमारदारों ने बयां किए। तीमारदार रविता, बिलकिश, रिहाना, वाजिद, रहीस, अहसान, रिजवाना, सुभाष, पाल्लूराम, अयूब, नाजो पत्नी आस मोहम्मद निवासीगण गांव मंसूरा, अफसाना पत्नी वाजिद निवासी नई बस्ती गाड़ीवाला चौराहा झिंझाना, स्वाती पत्नी देवेंद्र, गांव जमालपुर, रविता पत्नी मनोज निवासी गांव गागोर ऊन ने बताया कि सीएचसी में ना खाना है न ही दूध है। जब से वे भर्ती है, उनको अस्पताल में कोई भोजन नहीं दिया गया। परिजन घर से ही दलिया आदि सामान बनाकर ला रहे है।
क्या है नियम
सरकारी अस्पताल में प्रसव कराने महिला जब तक अस्पताल में भर्ती रहेगी, उसे निशुल्क भोजन दिया जाएगा। नाश्ते में ब्रेड, दूध मक्खन और अंडा दिया जाता है। दोपहर और रात्रि के भोजन में रोटी दाल सब्जी सलाद पराठा आदि दिया जाता है।
कहां बन रहा खाना?
सीएचसी की रसोई को देखे तो यहां के हालात कागजी खेल को दर्शाने के लिए काफी है। रसोई में मात्र चार डिब्बे रखे हुए हैं, सफाई व्यवस्था नहीं है। गैस चूल्हा भी दो किलो वाले सिलेंडर से चलाया जा रहा है। रसोईमाता गीता ने बताया कि नास्ते में ब्रेड और दूध दिया जा रहा है। खाने में रोटी और सब्जी आदि दे रहे है। ठेकेदार कुलदीप कुमार है, जो खाने के सामान की व्यवस्था करता है।
पीने के पानी की स्थिति भी है खराब
सीएचसी में रोजाना हजारों की संख्या में मरीज आते है। गर्मी आ चुकी है, लेकिन आज तक उनके लिए नल की व्यवस्था नहीं की गई। यहां पर मात्र एक ही नल है, जिसका पानी पीला आ रहा है। मरीजों व उनके तीमारदारों को पीने के पानी के लिये भटकना पड़ता है। सीएचसी के बाहर से पीने के पानी को लाना पड़ रहा है।
शौचालयों में लटका ताला
एक तरफ जहां खुले में शौच के लिए सरकार अभियान चला रही है, वही झिंझाना में शौचालयों में ताले लटके हुए है। शौच के लिए भी बाहर जाना पड़ रहा है।
पीने के पानी के लिये कई बार नगर पंचायत को लिखा जा चुका है। बजट नहीं होना बताकर पल्ला झाड़ रहे है। खाना मेन्यू के अनुसार दिया जा रहा है। - डाक्टर प्रवीण कुमार, ऊन ब्लाक प्रभारी।