संवाद न्यूज एजेंसीशामली। जैन मुनि 108 विव्रत सागर ने कहा कि जिस प्रकार शरीर को जीवित रखने के लिए सांस आवश्यक होती है, वैसे ही शिष्य के जीवन को सार्थक और उन्नत बनाने के लिए गुरु भक्ति अत्यंत आवश्यक है।
रविवार को जैन धर्मशाला में प्रवचन करते हुए जैन मुनि ने मानव जीवन को अत्यंत दुर्लभ बताया। इससे आगे जैन कुल में जन्म लेना और उससे भी बढ़कर सच्चे सद्गुरु की प्राप्ति होना ये सभी दुर्लभ सौभाग्य की श्रेणी में आते हैं। फिर भी अधिकांश लोग इन अवसरों का वास्तविक महत्व नहीं समझ पाते और उनका सदुपयोग करने से वंचित रह जाते हैं।
उन्होंने भरत चक्रवर्ती का उदाहरण देते हुए कहा कि जब तक उनके बाल काले थे, वे सांसारिक भोगों और ऐश्वर्य में लिप्त थे, लेकिन जब उन्होंने अपने सिर में एक सफेद बाल देखा, तो उन्हें जीवन की क्षणभंगुरता का बोध हुआ। उस क्षण उन्होंने संसार से विरक्ति का मार्ग अपनाया। यह उदाहरण इस बात को स्पष्ट करता है कि जब व्यक्ति को अपने जीवन की दुर्लभता और उसकी अस्थिरता का बोध होता है, तभी वह आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ता है। इसलिए आवश्यक है कि हम गुरु की कृपा से प्राप्त इस दुर्लभ जीवन और सत्संग का पूर्ण लाभ लें और आत्मा की शुद्धि व मोक्ष की दिशा में अग्रसर हों।
प्रवचन की शुरूआत वीरेश जैन परिवार द्वारा चित्र अनावरण से हुई। एसएस जैन सभा के अध्यक्ष नानकचंद जैन परिवार द्वारा पाद प्रक्षालन, ताराचंद जैन, विजय कुमार जैन परिवार द्वारा और शास्त्र भेंट अशोक जैन परिवार द्वारा किया गया। जैन मुनि की आहार चर्या मोहित जैन सुनीता जैन परिवार द्वारा भक्ति भाव से कराई गई।