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जहां क्षमा, वहां क्रोध और ईर्ष्या का वास नहीं

Thu, 08 Sep 2016 11:35 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, शामली
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religious - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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शामली। अन्नत चौदस तक चलने वाले दिगंबर जैन समाज के दशलक्षण पर्व शुरू हो गए है। 16 सितंबर को क्षमा वाणी पर्व मनाया जाएगा। जैन संत राजेंद्र मुनि महाराज ने उत्तम आर्जव धर्म के बारे में बताया। कहा कि जब मनुष्य के मन, काया, अंदर, बाहर एक रूप होते हैं। वही आर्जव धर्म है। जहां क्षमा रहती है, वहां क्रोध ईष्या नहीं रहती है।
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बृहस्पतिवार को मिल रोड स्थित श्री श्वेतांबर जैन स्थानक में जैन संत राजेंद्र मुनि महाराज ने कहा कि मनुष्य जीवन एक बगीचा है, जिसमें तरह-तरह के फूल खिले हैं। इस जीवन को हराभरा रखने के लिए मनुष्य को लोभ, मोह, क्रोध, अहंकार व माया को छोड़कर मधुुुरता, कोमलता, प्रेम, सद्भाव, क्षमा लानी होगी। कहा कि दशलक्षण आध्यात्मिक पर्व है। इस पर्व में भक्ति, व्रत उपवास का महत्व है। जब आत्मा एक शरीर से छोड़कर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है, तो ओर जन्म लेती है, तब आत्मा को दिव्य कर्मों का मनुष्य को फल मिलता है। 

केवल अन्नत आत्माएं मोक्ष को जाती है। मोक्ष को जाने एवं दूसरे आत्मा में प्रवेश में आत्मा को कितना समय लगता है। जैन संत ने दशलक्षण  पर्व के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दशलक्षण पर्व में दस धर्म आते है। सभी धर्मों को अपनाना चाहिए। जीवन में प्रत्येक धर्म का महत्व है।
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मौके पर जैन संत पुनीत महाराज ने कहा कि  जिस मनुष्य ने  मन को जीत लिया उसने सारे  जग पर विजय प्राप्त कर ली है। मन का परिवर्तन करना बड़ा मुश्किल कार्य है। प्रसन्न चौधरी ने जैन संत का आशीर्वाद लिया।  मौके पर अशोक कुमार जैन, विजय जैन, नानकचंद जैन, राहुल जैन, पंकज, आलोक जैन, विपुल जैन, जेके जैन, राकेश जैन मौजूद रहे।
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