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बेटी-बेटे के हवाले राजनीतिक विरासत

Tue, 24 Jan 2017 12:02 AM IST
ब्यूराो /अमर उजाला, शामली
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netaji
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शामली। परिवारवाद और वंशवाद को लेकर राजनीतिक दल बड़ी बड़ी बातें करते हैं। बावजूद इसके अपने परिवार को राजनीतिक विरासत सौंपने में नेता पीछे नहीं हैं। प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने परिवार के कई लोगों को राजनीति में उतारा, तो दूसरे दलों ने परिवारवाद के आरोपों की बौछारें कीं।
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शामली जिले के नेता भी परिवारवाद को बढ़ावा देने में अछूते नहीं हैं। कोई अपनी बेटी, तो कोई बेटे को राजनीतिक विरासत पर काबिज कराना चाहता है। यही वजह है कि शामली जिले की तीनों ही सीटों पर ऐसे प्रत्याशी आज चुनावी मैदान में हैं, जिनका          परिवार लंबे समय से राजनीति करता आया है। 

राजनीति में वंशवाद को बढ़ावा देने वाले नेताओं की सूची में कैराना से भाजपा सांसद हुकुम सिंह का नाम भी जुड़ गया है। उन्होंने इस बार अपनी बेटी मृगांका सिंह को कैराना सीट से विधानसभा चुनाव के लिए मैदान में उतार दिया है। हुकुम सिंह कैराना सीट से सात बार विधायक रह चुके हैं तथा कैराना लोकसभा क्षेत्र से मौजूदा सांसद भी हैं। राजनीतिक विरासत बेटी को सौंपने की वजह से ही उन्हें अपने परिवार में कलह तक झेलनी पड़ रही है और उनके खानदान के ही अनिल चौहान बगावत करके मृगांका सिंह के सामने ही रालोद के टिकट पर चुनाव मैदान में आ खड़े हुए हैं। 
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वहीं, कैराना सीट से ही नाहिद हसन भी दूसरी बार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। नाहिद हसन के पिता मरहूम मुनव्वर हसन 1991 और 1993 में कैराना
सीट से विधायक बने, तो 1996 के लोकसभा चुनाव में कैराना सीट से ही सांसद चुने गए थे। 

उनकी राजनीतिक वंशबेल को आगे बढ़ाने वाले नाहिद हसन 2014 के उपचुनाव में कैराना विधानसभा सीट से विधायक बने और इस बार भी वह सपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। 

इसके अलावा जिले के तीसरे राजनीतिक घराने की बात करें, तो सपा एमएलसी वीरेंद्र सिंह के बेटे मनीष चौहान शामली सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। वीरेंद्र सिंह 1980 से 1991 तक और फिर 1996 से 2002 तक कांधला सीट से छह बार विधायक रह चुके हैं।

 पिछले दिनों समाजवादी पार्टी ने मनीष चौहान को शामली सीट से प्रत्याशी घोषित किया था, लेकिन सपा-कांग्रेस के गठबंधन में यह सीट कांग्रेस को मिल गई, जिसके चलते मनीष चौहान ने निर्दलीय ही चुनाव लड़ने की ठान ली। उधर, थानाभवन सीट पर बसपा प्रत्याशी राव अब्दुल वारिस भी अपनी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके पिता राव अब्दुल राफे खां 1969 में थानाभवन सीट से ही बीकेडी के टिकट पर विधायक बने थे। 

वर्ष 2000 के उपचुनाव में अब्दुल वारिस की मां राव मुशर्रत बेगम ने भी थानाभवन सीट से ही किस्मत आजमाई थी, लेकिन उन्हें जीत नहीं मिल सकी थी। इसके बाद राव अब्दुल वारिस 2007 में रालोद के टिकट पर चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे, लेकिन 2012 के चुनाव में बसपा के टिकट पर अब्दुल वारिस हार गए थे।
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