सात सितंबर 2013 को जिले में सुलगी हिंसा की आग के बाद जनपद के 949 परिवार अपने गांव और घर छोड़ने को मजबूर हुए थे। मासूम बच्चों के साथ पूरी रात जंगलों में काटी। ठंड और बरसात में खुली छत के नीचे राहत शिविरों में रहे। आज कांधला और कैराना क्षेत्रों में एनजीओ की मदद से बसी विस्थापित कालोनियों में रहकर ये परिवार खुद को संभालने की कोशिश कर रहे हैं। अपने गांव में खेतों में मजदूरी तो मिल जाती थी, लेकिन इनमें से कुछ परिवार तो दो वक्त की रोटी को मोहताज हैं। अमर उजाला ने इन
केस-1
कांधला की जन्नत कालोनी में बसे गांव लिसाढ़ निवासी सलीम के परिवार ने हिंसा के बाद अपना गांव छोड़ा था। परिजनों ने बताया कि उनका गांव का घर खंडहर पड़ा है। उसे कोई लेने को भी तैयार नहीं है। पहले गांव वालों के खेतों में मजदूरी करके पेट पालते थे, लेकिन अब रोजगार को भटक रहे हैं। काम मिल गया तो रोटी मिल जाती है वरना भूखे सोना पड़ता है। बेटियां बड़ी हो रही हैं लेकिन उनकी शादी नहीं हो पा रही हैं।
केस-2
मुजफ्फरनगर के गांव कुटबा निवासी महबूब का परिवार हिंसा के बाद अपना घर छोड़कर शरणार्थी शिविर में आ गया था। सरकार ने पांच लाख की मदद दी थी, लेकिन वो किसी ने धोखे से हड़प ली। अब कांधला की जन्नत कॉलोनी में रह रहा है, लेकिन यहां न पानी है ना बच्चों की पढ़ाई का इंतजाम। कभी काम मिल जाता है कभी भूखे रहना पड़ता है। गांव में सभी एक दूसरे के सुख दुख में शामिल होते थे, लेकिन यहां कोई पूछने वाला नहीं है।
केस -3
गांव लाख निवासी लियाकत का कहना है कि सांप्रदायिक दंगे के बाद लोगों ने अपनी जान बचाने के लिए कांधला में शरण ली थी, तब से लेकर आज तक परिवार मूलभूत सुविधाओं के लिए भटक रहा है। परिवार में काम धंधा नहीं है। पांच बेटी ओर दो बेटे हैं, जो शादी के लिए तैयार है लेकिन कोई शादी के लिए तैयार नहीं है। अपना गांव छोड़ने के बाद दर दर की ठोकरें ही मिली हैं।
केेस-4
कैराना में भूरा बाईपास के पास बनी शफा कालोनी में रहने वाला दंगा पीड़ित मेहरबान के परिवार की वसीला ने बताया कि गांव में हुई हिंसा के बाद वे पूरी रात जंगलों में छिपते हुए कैराना आए। कोई सामान तक नहीं था। कई महीने सरकारी राहत शिविर में रहने के बाद एनजीओ द्वारा बसाई गई कालोनी में मिले मकान में रहने लगे। ससुर हाजी जमील को सरकार ने पांच लाख का मुआवजा दिया, लेकिन उनके परिवार को कुछ नहीं मिला। यहां उसके बच्चे स्कूल व मदरसे में पढ़ रहे हैं। उनका मकान गांव में ही पड़ा है। पति मजदूरी करके परिवार को पेट पालता है।
केस-5
कैराना की हसन स्टील फैक्टरी के पास अपना घर कालोनी में मकान बनाकर रहने वाले कुटबा निवासी मोहम्मद. शहजाद ने बताया कि वो तीन भाई हैं। हिंसा में उनके पिता वहीद की हत्या कर दी गई थी। उनके घर पर भी हमला हुआ था, लेकिन तभी फोर्स आ गई थी। उन्हें वहां से निकालकर शाहपुर थाने में पहुंचाया। भाइयों को 10 लाख का मुआवजा मिला था, जिसमें तीनों ने अपने मकान बना लिए। एक भाई को शामली तहसील में चपरासी की नौकरी मिली थी। उनका मकान गांव में ही खाली पड़ा है अब वे गांव वापस नहीं जाना चाहते।
केस -6
कैराना की शफा कालोनी में रहने वाले लिसाढ़ निवासी आदिल की पत्नी अफसाना ने बताया कि उसके चार बच्चेे हैं। पति सरिया बांधने की मजदूरी करता था। हिंसा के बाद वे भागे और पूरी रात जंगलों में काटी। बड़ा बेटा 12 साल का है। पति मजदूरी करता है। उनका मकान गांव में ही खंडहर बना है, लेेकिन वो दिन याद कर गांव में जाने का दिल नहीं करता। यहीं रहकर मजदूरी कर परिवार पाल रहे हैं। बच्चों को पढ़ा रहे हैं। जेठ को सरकार ने मुआवजा दिया उन्हें नहीं।,
केस -7
शफा कालोनी में रहने वाले दंगा पीड़ित लिसाढ़ निवासी अफरोज ने बताया कि वो गांव में किराए की छोटी सी दुकान में टायर पंचर की दुकान करता था। हिंसा में उनके परिवार पर हमला हुआ था। जिसमें उसके पिता जाविल और उसे चोट आयी थी, लेकिन पुलिस के आ जाने के कारण उनकी जान बच गई थी। उनका गांव में अपना मकान है। जो अब टूटा हुआ पड़ा है। पांच लड़की और दो लड़के है। किसी की शादी नही हुई । पिता का मुआवजा मिला था अब यहां चैन से रह रहे हैं।
केस-8
शफा कालोनी में रहने वाले लिसाढ़ के इनाम ने बताया कि वो रात उनके जहन में आज भी बसी है जब गांव में हिंसा हुई। उन्हें लगा कि वे नहीं बचेंगे लेकिन किसी तरह जंगलों के रास्ते भागे। अब एक बेटा 13 साल का व दूसरा बेटा आठ साल का है। एनजीओ द्वारा उन्हें रहने के लिए मकान दिया गया है। बच्चे स्कूल में पढ़ रहे हैं और वो मजदूरी करता है।
केस 9
लिसाढ़ निवासी मुरतजा की पत्नी फातिमा ने बताया कि उनके एक बेटी और छह बेटे है। उन्हें हिंसा का माहौल पहले से ही नजर आने लगा था। गांव छोड़कर भागे। पहले मलकपुर में राहत शिविर में महीनों तक रहे। बाद में एनजीओ ने रहने को शफा कालोनी बसाई और उसमें मकान दिया। बच्चे अभी छोटे हैं जो यहां कालोनी के मदरसे में पढ़ रहे हैं।