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कैराना की सियासत का केंद्र, चौपाल और चबूतरा

Fri, 24 Jun 2016 12:27 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, शामली
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कैराना की कलस्यान चौपाल। - फोटो : अमर उजाला
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शामली के कैराना में राजनीति की दो धुरी  हैं। एक है चौपाल, तो दूसरा चबूतरा। हिंदू गुर्जरों की निष्ठा कलस्यान चौपाल में निहित है, तो मुस्लिम गुर्जरों की चबूतरे पर। यह बात अलग है कि दोनों ही कलस्यान खाप से हैं। इन्हीं दोनों स्थानों से कैराना की राजनीतिक केंद्रित रही। सत्ता चाहे जिस पार्टी के हाथ रही, मगर कैराना की राजनीति का केंद्र चौपाल और चबूतरा ही रहा। 
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बात कलस्यान चौपाल की करें, तो यहां की राजनीतिक बागडोर हुकुम सिंह के हाथ में रही। 1974 में राजनीतिक सफर शुरू करने वाले हुकुम सिंह सात बार विधायक चुने गए। पूर्व में कांग्रेस की सरकार में वह प्रदेश में कैबिनेट मंत्री भी रहे। कांग्रेस के अलावा रालोद के टिकट पर भी कैराना सीट से जीतकर विधायक बने। फिर कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होकर विधायक बने। तब से लगातार भाजपा में हैं और कई बार  विधायक बने। 2012 में भाजपा टिकट पर सांसद बने।
जानकार बताते हैं कि तब राजनीतिक दौर में हुकुम सिंह की खूब चलती थी। अफसरों को हुकुम सिंह के हुकम मानने पड़ते थे। वहीं, 1984 में इंदिरागांधी लहर के दौरान मुस्लिम गुर्जर अख्तर हसन कांग्रेस के टिकट पर सांसद चुने गए। उनकी राजनीतिक विरासत चौधरी मुनव्वर हसन ने संभाली और बखूबी आगे बढ़ाई। मुनव्वर हसन एकमात्र ऐसे नेता रहे, जिन्होंने सबसे कम आयु में विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा और राज्यसभा (चार सदन) का सदस्य बनने का गौरव प्राप्त किया।  
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यह गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में भी दर्ज बताया जाता है। हादसे में मुनव्वर हसन का इंतकाल होने के बाद बसपा के टिकट पर उनकी पत्नी तबस्सुम हसन 2009 में सांसद चुनी गई। चबूतरे की राजनीति को अब उनके पुत्र नाहिद हसन आगे बढ़ा रहे हैं। वह 2014 के उपचुनाव में सपा के टिकट पर कैराना सीट से विधायक चुने गए। 
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