बृहस्पतिवार की रात को प्रदीप कुमार के शहीद होने की खबर मिली तो हर कोई गमजदा नजर आया। उनके आवास पर कस्बे के लोगों की भीड़ पहुंचनी शुरू हो गई थी। अगले दिन शुक्रवार को भी लोगों का आने आवास पर पहुंचकर गमजदा परिवार के दुख में शामिल हुआ। परिजनों के मुताबिक प्रदीप कुमार ने शिक्षा शामली में ही ग्रहण की। उन्होंने वीवी डिग्री कालेज से बीए की परीक्षा पास करने के बाद 2003 में सीआरपीएफ में मथुरा में भर्ती हुए। उनकी ट्रेनिंग बरेली में हुई। वर्तमान में उनकी तैनाती जम्मू कश्मीर में हुई थी। शादी होने के डेढ़ साल बाद ही उनकी सीआरपीएफ में नौकरी लग गई थी। शादी के करीब दो-तीन साल बाद से ही वे बच्चों के साथ भले ही गाजियाबाद में रह रहे थे। मगर, बनत से उनका मोह कम नहीं हुआ। जब भी वे छुट्टी आते थे तो यहां भी जरूर आते थे। उनकी मेहनत और ईमानदारी को लेकर कस्बे में दिनभर लोग चर्चा करते रहे। कस्बा बनत निवासी आसिफ खान ने कहा कि प्रदीप बहुत ही मिलनसार और व्यवहार कुशल व नेक दिल इंसान थे। दिनेश कुमार ने कहा कि वे जब भी छुट्टी आते थे, सभी लोगों से मिलते जुलते थे। राजेंद्र सिंह ने बताया कि रास्ते में कोई भी मिला, बिना बोले और हाल-चाल जाने बिना नहीं रहते थे। ओंकार सिंह ने बताया कि उनके बारे में जितना भी कहा जाए, वह कम है। उनकी अच्छाई और व्यवहार हमेशा याद किया जाएगा। वे मेहतनी और काम के प्रति लगनशील रहते थे।
पढ़ाई के साथ कबड्डी के अच्छे खिलाड़ी भी रहे
शामली। प्रदीप कुमार पढ़ाई के साथ कबड्डी के भी खिलाड़ी थे। कालेज के दिनों में कस्बे और बाहर कबड्डी प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए अपनी टीम के साथ जाते थे। इसके साथ ही उनमें धार्मिक भावना भी कूट-कूटकर भरी थी। नौकरी लगने के बाद दिल्ली से बालाजी तक उन्होंने पैदल यात्रा की। कस्बे से पैदल ही मां शाकंभरी देवी भी दर्शन करने गए थे।
पत्नी और बच्चों से दोपहर में ढाई बजे आखिरी बार हुई बात
शहीद के बड़े बेटे सिद्धार्थ ने बताया कि वे गाजियाबाद स्थित आवास से 12 फरवरी को ड्यूटी पर गए थे। अगले दिन 13 फरवरी को जम्मू पहुंचकर उन्होंने अपनी आमद कराई। इसके बाद देर रात में उनकी कानवाई श्रीनगर के लिए निकली थी। 14 फरवरी की दोपहर ढाई बजे उनकी और मम्मी की फोन पर आखिरी बार बात हुई। उन्होंने बताया था कि वे दो-ढ़ाई घंटे में श्रीनगर पहुंच जाएंगे और इसके बाद बात करेंगे। साथ ही उन्होंने मोबाइल की बैटरी कम होना भी बताया था। उन्होंने चार बजे उनके फोन पर कॉल की तो कोई रेस्पांस नहीं मिला। उन्होंने समझा कि बैटरी खत्म हो गई होगी, लेकिन इसके बाद जब टीवी पर पुलवामा हमले की खबर फ्लैश हुई तो उन्हें चिंता होने लगी थी। रात में बनत में उनके दादा जगदीश प्रसाद को बटालियन से उनके शहीद होने की खबर मिली थी। पिता जगदीश प्रसाद ने रोते हुए बताया कि 12 फरवरी को ड्यूटी पर जाने से पहले प्रदीप ने मां को फोन किया था, लेकिन बात नहीं हो सकी थी।