शामली। वातावरण में बढ़ते प्रदूषण के कारण लोगों में अस्थमा के रोगी बढ़ रहे हैं। अस्थमा के मरीज अस्पताल में रोजाना आ रहे हैं। इसकी वजह ये है कि इस समय गेहूं की कटाई का सीजन चल रहा है और तेज हवा चल रही है। ऐसे में भूसे व धूल का गुब्बार अस्थमा के मरीजों की परेशानी बढ़ा रहा है। चिकित्सकों का कहना है कि अस्थमा के मरीजों को धूल व धुएं से बचाव करना चाहिए और नियमित रूप से अपनी दवा लेनी चाहिए।
हर साल सात मई को विश्व अस्थमा दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को अस्थमा रोग के बारे में जानकारी देना और बचाव के लिए जागरूक करना है। यह बीमारी वैसे तो आनुवंशिक होती है, लेकिन वायु प्रदूषण व अन्य कई कारणों से भी यह रोग होता है। धूल, धुआं, मानसिक तनाव, मौसम में बदलाव व ठंडी-खट्टी चीजों का ज्यादा सेवन करने से भी यह बीमारी हो सकती है। फिजिशियन डॉ. पंकज गर्ग ने बताया कि सांस फूलना, छाती में सीटी की तरह की आवाज आना, दम घुटना, छाती में जकड़न व बलगम आदि अस्थमा के लक्षण है। आनुवंशिक रोग होने के कारण यह बीमारी खत्म नहीं होती। बच्चों में यह 16 साल की उम्र में ठीक हो जाती है, लेकिन 40 साल के बाद यह बीमारी फिर से उभरकर सामने आने की संभावना रहती है।
बताया कि इस समय गेहूं की कटाई का सीजन होने के कारण धूल व भूसे के कण वातावरण में ज्यादा होने से मरीजों की संख्या बढ़ गई है। नियमित दवाओं का सेवन करने और इन्हेलर का इस्तेमाल करने से यह रोग नियंत्रित रहता है। इन्हेलर सबसे अच्छा उपचार है। इसमें दवा कम होती है और सीधे फेफड़ों पर असर करती है। जिला अस्पताल की सीएमएस डॉ. अंजू जोधा का कहना है कि अस्थमा के लक्षण नजर आते ही जांच करानी चाहिए। समय से उपचार कराने से यह बीमारी पूरी तरह नियंत्रित रहती है। रोगी समय पर दवा ले और धूल व धुएं आदि से बचाव करें। जागरुकता ही सबसे बड़ा बचाव है।