शामली। बच्चों में बढ़ता आक्रामक व्यवहार अभिभावकों के लिए चिंता का कारण बनता जा रहा है। छोटी-छोटी बातों पर टोकने या किसी काम से मना करने पर बच्चे अपने ही माता-पिता से उलझ जाते हैं। ऐसे ही मामलों को लेकर जिला अस्पताल के मनकक्ष में हर महीने तीन-चार बच्चे काउंसिलिंग के लिए पहुंच रहे हैं।
जिला अस्पताल में मनकक्ष में तैनात क्लीनिकल साइक्लोजिस्ट प्रेरणा पुंडीर ने बताया कि बच्चों में ऐसा व्यवहार भावनात्मक असंतुलन और बढ़ते मानसिक दबाव का नतीजा है। बच्चे अपनी भावनाओं को सही तरीके से व्यक्त नहीं कर पाते, जिससे उनमें गुस्सा और चिड़चिड़ापन आ जाता है। कई बार बच्चे घर के माहौल से यह व्यवहार सीखते हैं और उसी की नकल करते हैं। जरूरत से ज्यादा स्वतंत्रता देना और अनुशासन की कमी भी इसके प्रमुख कारण हैं।
उन्होंने बताया कि ऐसे मामलों में नियमित काउंसिलिंग से बच्चों के व्यवहार में सुधार आ रहा है। साथ ही अभिभावकों को भी सलाह दी जाती है कि वे बच्चों के साथ भावनात्मक जुड़ाव रखें, उनकी बात धैर्य से सुनें और घर में सकारात्मक व स्वस्थ संवाद का माहौल बनाएं।
इस तरह के आ रहे केस
केस एक : शामली शहर के दस वर्षीय बालक के अभिभावकों ने बताया कि टोकने पर वह उनके साथ झगड़ा करता है और बहुत ज्यादा गुस्सा करता है। समझाने पर भी नहीं मानता।
केस दो : कैराना के आठ वर्षीय बालक के अभिभावकों ने बताया कि वह मोबाइल फोन पर ही लगा रहता है। रोकने या टोकने पर वह झगड़ने लगता है और गुस्से में जोर-जोर से चिल्लाने लगता है।