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जाट मुसलिम गठजोड़ से मिलेगी रालोद को संजीवनी

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शामली।
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मुजफ्फरनगर के सांप्रदायिक दंगे के बाद राजनीति की बिसात पर बिखर चुके मोहरों को रालोद ने फिर से सहेजना प्रारंभ कर दिया है। पुराने दिग्गज मुसलिम नेताओं की पार्टी में एंट्री तो यही बयां कर रही है कि जाट-मुसलिम गठजोड़ से रालोद को संजीवनी मिल सकती है। यह संकेत पूर्व सांसद अमीर आलम खान के रालोद में शामिल होने से दिखाई पड़ने लगा है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली, मुजफ्फरनगर, बागपत, सहारनपुर और मेरठ में जाट और मुसलिम गठजोड़ के सहारे ही रालोद को मजबूती मिलती थी। कभी एक वक्त में सहारनपुर में रशीद मसूद, मुजफ्फरनगर में कादिर राना, अमीर आलम खान, तो बागपत में नवाब कोकब हमीद और मेरठ से डॉक्टर मेहराजुद्दीन सहित कई बड़े मुसलिम चेहरे रालोद की शान बढ़ाते थे। वक्त बदलता गया, तो नेताओं की पार्टियां भी बदलती रहीं, लेकिन उसका खामियाजा लंबे समय तक रालोद को उठाना पड़ गया। उक्त सभी जिलें जाट और मुसलिम बहुल है। वहीं, जाट मुसलिम के साथ ही गुर्जर, कश्यप और सैनी का साथ चुनावों में रालोद की रणनीति को कामयाब बनाता था। इन जिलों में लोकसभा और विधानसभा चुनाव में रालोद प्रत्याशी या तो जीतते रहे या फिर कड़े मुकाबले में रहे। हालांकि वर्ष 2013 के मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक दंगे ने रालोद के मजबूत गठजोड़ को हिलाकर रख दिया था। उसी वजह से 2014 के लोकसभा चुनाव और फिर 2017 के विधानसभा चुनाव में रालोद को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। 2014 के लोकसभा चुनाव में रालोद अपने गढ़ बागपत की सीट भी नहीं बचा पाया था। इसी तरह 2017 के विधानसभा चुनाव में भी रालोद को भारी नुकसान उठाना पड़ा। शामली में रालोद को एक भी सीट नहीं मिली, तो बागपत में सिर्फ छपरौली सीट हाथ आई। मुजफ्फरनगर, सहारनपुर और मेरठ में एक भी सीट पर रालोद प्रत्याशी नहीं जीत पाए। अब पूर्व सांसद अमीर आलम खान और उनके बेटे नवाजिश ने रालोद में वापसी करा ली, तो दो महीना पूर्व ही बागपत के पूर्व मंत्री नवाब कोकब हमीद के बेटे अहमद हमीद भी रालोद में लौट आए। चर्चा है कि शामली के साथ ही अन्य जिलों के मुसलिम नेता भी रालोद में शामिल हो सकते हैं। यदि रालोद का पुराना गठजोड़ फिर से मजबूत होता है, तो वह आगामी लोकसभा चुनाव में दूसरे राजनीतिक दलों के लिए मुश्किल जरूर पैदा कर देगा। हालांकि रालोद का यह प्रयास अगले चुनावों में क्या गुल खिलाएगा, यह तो भविष्य के गर्भ में ही छिपा है।
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रालोद के दिग्गज मुसलिम चेहरे
--- शामली--
थानाभवन से 1969 में पहली बार चौधरी चरण सिंह की पार्टी से राव अब्दुल राफे खां विधायक चुने गए। फिर 1985 में अमीर आलम लोकदल के टिकट पर चुनाव जीते। 2007 में अब्दुल वारिस रालोद के टिकट पर जीते। वहीं, पूर्व सांसद मुनव्वर हसन 1991 में जनता दल के टिकट पर कैराना से विधायक बने। बाद में मुनव्वर हसन सपा में शामिल हो गए थे। इसी तरह कैराना लोकसभा सीट पर 1967 में चौधरी गय्यूर अली सांसद चुने गए, 1999 में अमीर आलम खान सांसद बने, तो 2004 में सपा-रालोद गठबंधन प्रत्याशी के तौर पर अनुराधा चौधरी सांसद चुनीं गईं।
--- बागपत
नवाब कोकब हमीद बागपत में बड़ा मुसलिम चेहरा रहे हैं। पूर्व में सपा-रालोद गठबंधन की सरकार में नवाब कोकब हमीद को मंत्री भी बनाया गया था। रालोद मुखिया चौधरी अजित सिंह बागपत लोकसभा सीट से चुनाव लड़ते रहे, लेकिन सांप्रदायिक दंगे के बाद 2014 के चुनाव में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। 2016 में नवाब कोकब हमीद के बेटे अहमद हमीद बसपा में शामिल हो गए थे, जो 2017 में बसपा के टिकट पर ही चुनाव लड़े। अभी दो महीना पूर्व ही अहमद हमीद वापस रालोद में शामिल हुए।
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------ मुजफ्फरनगर
पूर्व सांसद कादिर राना का राजनीतिक सफर भी रालोद के साथ प्रारंभ हुआ। वह 2007 के विधानसभा चुनाव में रालोद के सीट पर मोरना सीट से चुनाव जीते थे। बाद में वह रालोद छोड़कर बसपा में चले गए थे और 2009 के लोकसभा चुनाव में मुजफ्फरनगर सीट जीत गए थे। वहीं, 2004 में सपा -रालोद गठबंधन ने मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर मुनव्वर हसन जीते थे।
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