शामली। स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती ने कहा कि आर्य समाज कोई सांप्रदायिक संगठन नहीं, बल्कि एक वैचारिक क्रांति है। किसी भी जाति, संप्रदाय का व्यक्ति आर्य समाज की सदस्यता ग्रहण कर सकता है।
शामली में धीमानपुरा स्थित आर्य समाज मंदिर में 143 वें स्थापना दिवस के अंतिम दिन हरियाणा के पलवल से पधारे आचार्य श्रद्धानंद सरस्वती ने कहा कि आर्य समाज का दृष्टिकोण विश्वव्यापी है। संसार का उपकार करने के लिए 10 अप्रैल 1875 को ऋषि दयानंद ने मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की थी। 142 वर्ष के अंतराल में आर्य समाज ने देश, धर्म और जाति को बचाने के लिए अनेक आंदोलन किए। देश की आजादी में भी आर्य समाज का सर्वाधिक योगदान रहा है। लाला लाजपत राय, सरदार भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला, वीर सावरकर आदि आर्य समाज की पृष्ठभूमि के रहे हैं। सामाजिक क्षेत्र में सती प्रथा व कन्या भ्रूण हत्या पर कानूनी प्रतिबंध लगवाने में भी आर्य समाज ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
वहीं, भजनोपदेशक संदीप वैदिक ने भजनों के माध्यम से मार्गदर्शन किया। आचार्य चंद्रदेव ने कहा कि जो संसार में अच्छे कार्य करना चाहते हैं वह यज्ञ करें, क्योंकि यज्ञ श्रेष्ठ कर्म है। कार्यक्रम को स्वामी सत्यवेश ने भी संबोधित किया। इससे पूर्व आर्य समाज के आचार्य चंद्रदेव तथा आर्य समाज के पुरोहित डॉ. रविदत्त शास्त्री ने यज्ञ संपन्न कराया। यज्ञ के मुख्य यजमान रमेश चंद आर्य, दिनेश कुमार आर्य, परमानंद आर्य और सन्नी आर्य सपत्नीक रहे। कार्यक्रम के अध्यक्ष बीएसएम स्कूल के चेयरमैन सूर्यवीर सिंह तथा अतिथि आईआईए के पूर्व चेयरमैन नरेंद्र अग्रवाल रहे। इस दौरान संरक्षक रघुवीर सिंह आर्य, प्रधान पूरण चंद आर्य, मंत्री रामेश्वर दयाल आर्य, आर्य विद्या सभा के प्रधान राजपाल आर्य तथा प्रबंधक दिनेश आर्य, रविकांत आर्य, रमेश विश्वकर्मा, वेदप्रकाश आर्य, धर्मवीर आर्य, रामकुमार गुप्ता, सूर्यप्रकाश आर्य, बीरबल आर्य, कमला आर्या, अर्चना आर्या, श्वेता आर्या, पूनम आर्या, मृणाली आर्या, नीलम आर्या आदि उपस्थित रहे।