गांधी चौक स्थित श्री जैन स्थानक के सुधर्मा सभागर में श्री सुंदर मुनि महाराज नेे कहा कि श्रावक हो या साधू सभी जीवन में विकास चाहते हैं। उसके लिए हमें अंदर बाहर से एक होना पड़ेगा। जिसकी जैसी मति उसकी वैसी गति। स्मरण रखो जितना बचपन में भोलापन होता है उसमें जवान होने पर चालाकी भी आ जाती है।
उन्होंने कहा कि जवानी में इंसान कमाई व औरत के चक्कर में पड़ा रहता है। उसका अमन चैन खत्म हो जाता है। क्या यहीं जिंदगी जीने का रास्ता है। इसके लिए जीवन में साधना की जरूरत होती है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ दुनिया की चकाचौंध में फंसते जाते है और रोगों को गले लगाते जाते है। परिवार तो बढ़ता है, लेकिन हमेशा चक्करों में फंसे रहते है। साधना रूपी धर्म को अपनाकर विचारों पर कंट्रोल करके आगे बढ़ने से ही जीवन को शांति मिलेगी। क्रोध व गुस्सा तो चंद समय के लिए आता है। आत्मा को विभाव से छोड़कर स्वभाव में ही रखना होगा। अहिंसा सर्वश्रेष्ठ धर्म है। जो सभी धर्मों में माना है। ज्ञानी जनों ने कहा जिसके मन में दया भाव आ गया। वह सामने वाले के दुख को सुख में बदलने की ओर बढ़ जाता है। संसार के सभी जीव जीना चाहते है किसी भी धर्म में हिंसा को स्थान नही दिया गया है। अहिंसा संयम तप में ही धर्म बताया गया है। इस दौरान देवेंद्र, अमित, पवन, राहुल, उमेश, सहदेव, दीपक, मोहित, राधेलाल, जीवन, आदि लोग मौजूद रहे।