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अख्तर हसन के सामने तीसरे नंबर पर रही थी मायावती

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शामली।
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कई दशक से कैराना की राजनीति में हिंदू गुर्जर और मुस्लिम गुर्जर नेताओं का वर्चस्व रहा है। विधायक और सांसद की कुर्सी पर कभी हिंदू गुर्जर विराजित हुआ, तो कभी मुस्लिम गुर्जर से हसन परिवार का सदस्य। हसन परिवार को राजनीति में चौधरी अख्तर हसन ने ही स्थापित किया। उनका इंतकाल होने पर लोग अख्तर हसन की पुरानी बातों को याद करते नजर आए, जो उन्हें एकजुटता के सूत्र में पिरोती थीं।
1984 के लोकसभा चुनाव में चौधरी अख्तर हसन को कैराना लोकसभा सीट से कांग्रेस ने प्रत्याशी बनाया था। जबकि मायावती उस दौरान निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ी थीं। चुनाव नतीजों में अख्तर हसन भारी अंतर से जीते थे, जबकि दूसरे नंबर पर एलकेडी के प्रत्याशी श्याम सिंह रहे थे। वहीं, बसपा सुप्रीमो मायावती तीसरे नंबर पर रही थीं। उस चुनाव में सांसद बनने के बाद अख्तर हसन ने राजनीतिक क्षेत्र में अपने परिवार की पकड़ को मजबूत बना दिया था। इसके चलते ही उनके पुत्र चौधरी मुनव्वर हसन भी लंबे समय तक कैराना क्षेत्र की राजनीति पर हावी रहे। फिर अख्तर हसन की पुत्रवधू तबस्सुम हसन कैराना से सांसद बनीं, तो अब उनके पौत्र नाहिद हसन कैराना से विधायक हैं।
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शोक में न्यायिक कार्यों से विरत रहे अधिवक्ता
कैराना। पूर्व सांसद चौधरी अख्तर हसन के इंतकाल की सूचना पर कैराना बार एसोसिएशन ने शोक जताया। अधिवक्ता न्यायिक कार्यों से विरत रहे। बार भवन में शोक सभा का आयोजन हुआ, जिसमें अधिवक्ताओं ने दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। इस दौरान दिनेश चंद शर्मा, ब्रह्मपाल सिंह, शगुन मित्तल, आलोक चौहान, खड़क सिंह चौहान, राजकुमार चौहान और मेहरबान आदि अधिवक्ता मौजूद रहे।
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