बिखरे समीकरण को संजोना है मकसद
शामली। वर्ष 2013 के मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक दंगे के बाद रालोद का जाट-मुसलिम गठजोड़ बिखर गया था। जाट बिरादरी का वोट बड़ी संख्या में भाजपा की तरफ चला गया था। यही वजह है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में कैराना सीट पर रालोद प्रत्याशी करतार भड़ाना को महज 42,706 वोट मिल पाए थे। इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में भी कैराना सीट पर रालोद प्रत्याशी अनिल चौहान 19,903 वोट लेकर तीसरे, शामली सीट पर बिजेंद्र मलिक 33,551 वोट लेकर तीसरे और थानाभवन सीट पर भी रालोद प्रत्याशी जावेद राव 31,275 वोट लेकर तीसरे स्थान पर ही रहा था। इसी के चलते रालोद ने अपने पुराने गठजोड़ को जीवंत करने के लिए शामली और मुजफ्फरनगर में सामाजिक समरसता सम्मेलन किए। पूर्व सांसद अमीर आलम, पूर्व चेयरमैन अशरफ अली खान को रालोद में शामिल करके भी यही संदेश दिया था। अब कैराना लोकसभा सीट के उपचुनाव में तबस्सुम हसन को प्रत्याशी बनाया गया है। देखने वाली बात यह होगी कि रालोद द्वारा किए गए प्रयास और प्रत्याशी के चयन में अपनाए गए नए फार्मूले से गठबंधन को कितना फायदा होता है और कितना नुकसान।
हुकुम सिंह को मिले थे तीनों पार्टियों से ज्यादा वोट
कैराना लोकसभा सीट पर 2014 में हुए चुनाव में हुकुम सिंह विजयी हुए थे और उनको 5,65,909 वोट मिले थे। वहीं, सपा प्रत्याशी नाहिद हसन को 3,29,081, बसपा प्रत्याशी कंवर हसन को 1,60,414 और रालोद प्रत्याशी करतार भड़ाना को 42,706 वोट मिले थे। इन तीनों ही प्रत्याशियों के वोटों को जोड़ा जाए तो 5,32,201 वोट बैठते हैं। इस लिहाज से भाजपा प्रत्याशी को तीनों पार्टियों से 33,708 वोट ज्यादा प्राप्त हुए थे।