आजादी के बाद शामली की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में पूर्व राज्यपाल वीरेंद्र वर्मा और कांग्रेस के धुरंधर नेता लाला सलेक चंद संगल होते थे, जो एक दूसरे गुट को हराने के लिए प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारते थे। अब लाला सलेकचंद के परिवार के लोग सक्रिय राजनीति में नहीं है। उनके पुत्र का कहना है कि राजनीति भ्रष्ट हो गई है, बगैर पैसे टिकट नहीं मिलता और चुनाव में मोटा पैसा खर्च होता है।
लाला सलेकचंद संगल 1953 से 1964 तक नगरपालिका परिषद शामली के चेयरमैन रहे। नौ फरवरी 1969 में विधानसभा चुनाव के दौरान ऊन कस्बे में लाला सलेकचंद की हत्या हो गई थी। फिर वर्ष 1988 में उनके पुत्र विजय संगल ने कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में शामली नगरपालिका परिषद के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा, मगर वह राजेश्वर बंसल से 140 वोट से चुनाव हार गए थे। तब से अब तक करीब 29 वर्ष हो गए, लेकिन इस परिवार के सदस्य ने सक्रिय राजनीति में हिस्सेदारी नहीं की। लाला सलेकचंद संगल के पुत्र संजय जो वीवी इंटर कालेज के प्रबंधक हैं उनका कहना है कि अब नगर निकाय चुनाव पैैैसों का हो गया है। नेता के साथ ही वोटर अपना मताधिकार बेचने पर आमादा हो गए हैं। इन हालातों की वजह से उनके परिवार का मन राजनीति से खिन्न हो गया।
उनके पिता के कार्यकाल में शामली नगर पालिका कार्यालय का निर्माण कार्य कराया गया। तारकोल वाली सड़क बनवाई गई। 1962 में सबसे पहले हनुमान धाम और करनाल रोड पर नुमाइश- प्रदर्शनी लगवाई थी। इसके अलावा शहर के बीच पक्का नाले का निर्माण और शिक्षण संस्थाओं की स्थापना कराई थी, अब नेताओं को सिर्फ कुर्सी की लालसा रह गई है।