विधेयक का स्वागत, पर शरीयत के साथ
शामली। तीन तलाक को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद संसद में विधेयक पारित हो गया। अब कोई व्यक्ति तीन तलाक कहकर महिला को नहीं छोड़ सकेगा। संसद में विधेयक पारित होने पर मुसलिम समाज के लोगों की मिलीजुली प्रतिक्रिया है। कुछ लोगों ने विधेयक पारित होने को जायज ठहराया, तो ऐसे भी कुथ लोग हैं जिनका कहना है कि कानून तो बने, लेकिन शरीयत का भी ख्याल रखा जाए।
गौरतलब है कि तीन तलाक की वजह से महिलाओं को पीड़ा सहन करनी पड़ती है। पुरुष एक साथ तीन बार तलाक बोलकर महिला को छोड़ देते हैं, जिस कारण महिलाओं को न्यायालय की शरण में जाना पड़ता है। इसी कारण दंपति के बीच विवाद भी लगातार बढ़ते हैं। पुलिस के पास भी ऐसे मामले पहुंचते हैं। वहीं, लंबे समय से तीन तलाक का विरोध हो रहा था, जिसके चलते सुप्रीम कोर्ट ने भी तीन तलाक को गलत करार दिया था और केंद्र सरकार को इस पर कानून बनाने की बात कही गई थी। बृहस्पतिवार को संसद में तीन तलाक पर विधेयक रखा गया और उसे ध्वनिमत से पारित भी कर दिया गया।
समाजसेविका डॉक्टर नसरीन खान का कहना है कि कानून तो बने, लेकिन शरीयत का ख्याल भी रखा जाना चाहिए। क्योंकि हर धर्म के लोगों को अपने धर्म के मुताबिक आचरण करने का अधिकार है। उसमें किसी भी तरह का दखल नहीं होनी चाहिए। वहीं, समाजसेविका अफसाना का कहना है कि यदि शरीयत के खिलाफ कोई कानून बनता है, तो वह इसके साथ नहीं हैं। शरीयत में जो व्यवस्था दी गई है, उसी का पालन करेंगे। मौलाना शौकीन का कहना है कि मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रदेश अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों द्वारा इस पर जो निर्णय लिया जाएगा, हम उसी के साथ रहेंगे। उनके बगैर हम कुछ निर्णय नहीं करेंगे। शहर काजी रागिब सिद्दीकी का कहना है कि जो विधेयक पास हुआ है, उसे पहले ही पास हो जाना चाहिए था। क्योंकि शरीयत कहती है कि एक बार में तीन तलाक बोलकर महिला को अलग नहीं किया जा सकता है। एक बार तलाक बोलकर महिला को सोचने समझने का समय दिया जाता है। एकसाथ तीन बार तलाक बोलकर महिला को छोड़ने वालों को सजा तो मिलनी ही चाहिए।