तीन गोल्ड जीतने वाले को पेंशन तक नसीब नहीं
- फोटो : श्ााहजहांपुर उत्तर प्रदेश्ा
रियो के पैराओलंपिक खेलों में तमिलनाडु के थरियपारन थंगावेलु द्वारा हाई जंप में गोल्ड मेडल तथा नोएडा के वरूण मारी के कांस्य जीतने के बाद देश तथा प्रदेश की सरकारें उन पर धनवर्षा कर रहीं हैं, लेकिन व्यवस्था का विद्रूप देखिये कि ऐसे ही खेलों में तीन स्वर्ण समेत पांच पदक देश की झोली में डालने वाला नगर का एक अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी अपनी आजीविका के लिए बीते दो दशकों से खेल पेंशन की मांग कर रहा है, लेकिन प्रदेश या देश की सरकारें नहीं पसीजीं। इस खिलाड़ी के आवेदन की फाइल सरकारी दफ्तरों में दबी पड़ी है।
जीवन के करीब 52 बसंत पार कर चुके नगर के मोहल्ला प्रतापनगर निवासी दिव्यांग कौशलेंद्र प्रताप सिंह करीब 13 साल की उम्र में पेड़ से गिरे और इनके कमर से नीचे का हिस्सा बेकार हो गया। परिवार पर बोझ बनने के बजाय इन्होंने कुछ करने की ठान ली और खेलों की तरफ अपनी रूचि बढ़ाते हुए प्रयास शुरू कर दिए। जिसे देखते हुये इन्हें दिल्ली की राष्ट्रीय प्रतियोगिता मे खेलने का मौका मिला। वहां बेहतर प्रदर्शन करने पर वर्ष 1981 में जापान मे हुये अंतर्राष्ट्रीय पैराओलंपिक आयोजन में इन्हें भेजा गया। वहां कौशलेंद्र नें चेयर रेस समेत तीन प्रतियोगिताओं मे तीन स्वर्ण हासिल कर इतिहास रच दिया। इनकी कामयाबी का रथ वहीं नहीं रूका। उसके बाद 1982 में हांगकांग में हुये पेसफिक खेलो में इस खिलाड़ी ने एक रजत और एक कांस्य पर अपना कब्जा जमाकर देश को झूमने पर मजबूर कर दिया था।
मुफलिसी में भी जज्बे को कम नही होने दिया
कौशलेंद्र बताते हैं कि मौजूदा समय की तरह उन दिनों खिलाड़ियों पर पैसा लुटाने जैसी कोई बात नही थी और उसे सरकार की ओर से कोई ऐसी प्रोत्साहन राशि तक नहीं मिल सकी कि यह अपने भरण पोषण के लिये कोई स्थायी काम कर लेते। इसके बाद भी जब तक शरीर में ताकत रही अपने जज्बे को कम नहीं होने दिया परंतु अब शरीर साथ नही देता। बताया कि देश तथा प्रदेश की सरकारों ने पूर्व अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों के लिये पेंशन देने की योजना षुरू की थी जिसे पाने के लिये वह बीते दो दशकों से सरकारों से पत्राचार कर रहे हैं परंतु आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई।
बदतर हालात में काट रहे जिन्दगी
पैतृक गांव कोना याकूबपुर में कौशलेंद्र के हिस्से की खेती लायक अधिकांश जमीन बहगुल नदी में कट जाने के बाद इनके सामने भरण पोषण की समस्या खड़ी हो गई जो अभी तक बनी हुई है। नगर में मकान के नाम पर एक बदतर हालात का कमरा बना हुआ है जिसमे यह गुमनामी की जिंदगी काटने को विवश हैं। बताते हैं कि यदि पेंशन के संबंध में सरकार की नजरें इनायत हो जायें तो शायद बुढ़ापे में किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े।