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पिछले साल से 80 फीसदी कम हुई बारिश, प्रभावित होंगी फसलें

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शाहजहांपुर। मौसम के लिहाज से जनपद में मानसून सीजन जून के तीसरे सप्ताह से शुरू हो जाता है और बाद में जुलाई से अगस्त तक झमाझम बरसात होती है, लेकिन इस वर्ष जुलाई के हिस्से का पानी मई-जून में ही बरस गया। नतीजे में जुलाई माह सूखा निकल रहा है और बारिश नहीं होने से जनजीवन उमस भरी गर्मी से जूझ रहा है।
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गन्ना शोध परिषद के मौसम अनुभाग के आंकड़ों से भी इसकी पुष्टि होती है कि गत वर्ष की तुलना में इस वर्ष जुलाई में लगभग 80 फीसदी बारिश कम हुई है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार बारिश में देरी होने पर धान की रोपाई का काम प्रभावित होने के साथ ही गन्ना पौध फसल की बढ़वार पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा।
आंकड़े बताते हैं कि गत वर्ष मई और जून में महज 30-30 मिमी बरसात हुई, लेकिन इस वर्ष मई में 103 मिमी और जून में 137 मिमी पानी बरस गया। इसके विपरीत गत वर्ष जुलाई में 431 मिमी बारिश हुई जबकि इस वर्ष इसी माह अब तक सिर्फ 35 मिमी बरसात हुई है। हालांकि, अभी जुलाई खत्म होने में 14 दिन बाकी हैं, लेकिन मौसम विशेषज्ञों को नहीं लगता कि माह के शेष दिनों में बीते वर्ष जैसी बारिश हो पाएगी।
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शुक्रवार को भी सुबह हवा के अधिक दबाव का क्षेत्र बना रहने से तेज हवा चली तो बादल उड़ गए और बारिश की संभावना धूमिल पड़ने के साथ धूप निकलने से उमस भरी गर्मी का प्रकोप सताने लगा।
इस वजह से दिन में अधिकतम तापमान भी एक डिग्री बढ़कर 37 डिग्री सेल्सियस हो गया। गन्ना शोध परिषद के मौसम वैज्ञानिक डॉ. मनमोहन सिंह के अनुसार बीते मई-जून में व्यापक वर्षा उस वक्त हुई, जब कोई फसल नहीं होने से पानी की ज्यादा जरूरत नहीं थी। उन्होंने बारिश में आई कमी और बार-बार हवा के कम दबाव का क्षेत्र कमजोर पड़ने के लिए ग्लोबल वार्मिंग को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि शाम को बैरोमीटर सूचकांक सामान्य से 12 अंक नीचे आया है और वायुदाब शनिवार सुबह तक कम बना रहनेे की दशा में बादल छाने के बावजूद ज्यादा बारिश होने के आसार नहीं हैं।
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गत वर्ष और इस वर्ष हुई बारिश (मिमी में): एक नजर
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वर्ष 2020 वर्ष 2021
मई 30 103
जून 30 137
जुलाई 431 35 (16 जुलाई तक)
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थमेगी फसलों की स्वाभाविक बढ़वार
कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी अधिकारी एवं वरिष्ठ शस्य वैज्ञानिक डॉ. एनसी त्रिपाठी का कहना है कि धान की रोपाई और फसलों की स्वाभाविक बढ़वार के लिए अगले दो-तीन दिन में बारिश होना जरूरी है। ऐसा नहीं होने पर धान की रोपाई का काम पिछड़ जाएगा और गन्ना समेत अन्य फसलों की बढ़वार धीमी पड़ जाएगी। उन्होंने कहा कि मूंगफली, उड़द, ज्वार, बाजरा आदि फसलें कम पानी लेती हैं, लेकिन गन्ना पौध के लिए पानी मिलना बहुत जरूरी है। डॉ. त्रिपाठी के अनुसार वर्षा कम होने से खेतों की मृदा से नमी कम हो गई है। इसीलिए ज्यादा लागत लगाकर नलकूप से सिंचाई करने पर पानी की खपत ज्यादा होगी क्योंकि अधिकतर पानी जमीन सोख रही हैं।
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डीजल के दाम निकाल रहे जान
पुवायां। डीजल के दाम रोजाना बढ़ रहे हैं। इससे पंपिंग सेट से सिंचाई करना कठिन हो गया है। बिजली कटौती के चलते नलकूपों से भी खेतों की प्यास नहीं बुझ पा रही है। परेशान किसानों की उम्मीद बारिश पर टिकी है। वह भी नहीं हो रही है। मौसम विज्ञानी रोजाना मानसून के सक्रिय होने और जल्द ही भारी बारिश की बात की रहे हैं, लेकिन बादल आकर चले जाते हैं।
पुवायां तहसील क्षेत्र में धान की रोपाई लगभग हो चुकी है। किसानों ने धान की रोपाई पंपिग सेट और नलकूपों आदि से कर दी। उम्मीद थी कि कुछ ही दिन बाद मानसून सक्रिय हो जाएगा और सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ेगी। अगेती फसल होने के कारण धान की उपज भी बढ़िया होगी, लेकिन हालत यह हो चले हैं कि छोटे किसान धान की सिंचाई ही नहीं कर पा रहे हैं। गन्ने का भुगतान नहीं मिल रहा है और सिंचाई करनी है तो कर्ज लेना पड़ रहा है।
इससे किसानों को लग रहा है इस बार धान घाटे का सौदा हो जाएगा।
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सरकार को डीजल के रेट पर काबू पाना चाहिए। बिजली कटौती बंद की जानी चाहिए, जिससे किसान को लगे कि सरकार उनके हित की बात सोच रही है। डीजल के रेट कम नहीं हुए तो धान की फसल में घाटा होगा।
-लखविंदर सिंह, गांव रूरा खुटार
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किसान की सारी उम्मीदें बारिश पर टिकी हैं। बारिश नहीं होने के कारण किसान परेशान हैं। डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं। बारिश नहीं हुई तो धान की फसल में बहुत घाटा होगा।
-बलजिंदर सिंह, बंडा
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डीजल महंगा होने के कारण धान की फसल की सिंचाई करने में भारी नुकसान हो चुका है। एक तो बारिश नहीं हो रही है, ऊपर से बिजली कटौती की जा रही है। ऐसा रहा तो छोटे किसान धान की फसल की जिंदा नहीं रख पाएंगे।
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-विजय कुमार, गांव बंडी बंडा
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बारिश नहीं होने से किसान परेशान हैं। बिजली कम मिल रही है। किसानों के लिए डीजल के रेट अलग होने चाहिए और वाहनों के लिए डीजल के अलग रेट होने चाहिए।
-अंग्रेज सिंह, टिब्भी खमरिया खुटार
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