कृषि उत्पादन में अग्रणी जिले में इस बार मानसून की लेटलतीफी और अपर्याप्त बारिश के कारण मिनी पुवायां तहसील समेत अन्य क्षेत्रों में धान का उत्पादन कम होने की आशंका को बेमौसम की बरसात ने बढ़ावा दे दिया है। कृषि वैज्ञानिक और विभाग के अधिकारी भी मानते हैं कि बारिश का दौर नहीं थमा तो नमी में इजाफा होने से धान के पौधे खेतों में गिर सकते हैं और कीट-रोग भी बढ़ जाएंगे।
इस वर्ष 2.11 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में धान की रोपाई के लक्ष्य के विपरीत करीब 20 फीसदी रकबा अन्य वैकल्पिक फसलों की बुवाई से आच्छादित किया गया है। दरअसल, मध्य जुलाई तक मानसून की बेरुखी को देखते प्रशासन ने सूखा की स्थिति से निपटने की तैयारी की। इसी के तहत कृषि विभाग ने धान की रोपाई नहीं कर पाने वाले किसानों को कम पानी में बेहतर उपज देने वाली उड़द और तिल की फसलों के बीज अनुदान पर उपलब्ध कराए थे।
सिंचाई संसाधनों की दृष्टि से बेहतर तहसील पुवायां में किसानों ने नहरों और नलकूपों से खेत भरकर धान की पौध लगा दी, लेकिन जलालाबाद और तिलहर तहसील के कई विकास खंडों में तमाम खेत खाली रह गए। यही वजह रही कि इन दोनों तहसीलों के किसानों ने वैकल्पिक फसलों की बुवाई को हाथों-हाथ लिया। नतीजा यह हुआ कि लगभग 40 हजार हेक्टेयर में धान के बजाय उड़द, तिल, बाजरा आदि फसलों की बुवाई की गई। अब अचानक बारिश शुरू हो जाने से किसानों में घबराहट पैदा हो गई।
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लेट होगी धान की गहाई, बढ़ेगी उत्पादन लागत
उप निदेशक कृषि प्रसार डॉ. राधा कृष्ण यादव के अनुसार बारिश के साथ तेज हवा चलने से फसल खेत में गिरने की आशंका बढ़ जाएगी। पौधों में दाने पड़ चुके हैं, लेकिन नमी से उनके सूखने में वक्त लग सकता है, जिससे धान की गहाई में देरी हो जाएगी। डीडीआर के अनुसार मौसम जल्दी सामान्य नहीं हुआ तो फसल में फफूंद के साथ कीट-रोग लग सकते हैं जिनके उपचार से फसल की उत्पादन लागत बढ़ जाएगी।
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34 क्विंटल प्रति हेक्टेयर चावल उत्पादन लक्ष्य
जिला कृषि अधिकारी अखिलानंद पांडेय के अनुसार जिले में इस वर्ष 34 क्विंटल प्रति हेक्टेयर चावल उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि धान की प्रति हेक्टेयर पैदावार उसकी किस्म पर निर्भर करती है। उदाहरणार्थ, बासमती 20 से 25 क्विंटल और अन्य मोटी किस्मों का धान 50 से 60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मिलता है। इसीलिए औसत उत्पादकता लक्ष्य में धान के बजाय चावल को शामिल किया गया है।